कलेंडर के पन्ने घूम कर फिर उसी तारीख पर आ गए, पर देखो ना तुम आसपास हो ही नहीं, कुछ नहीं कहना आज, चुप रहना है. पर यादें उनका क्या करूँ, हज़ार मना करने पर भी सामने आ जाते है. कभी ये मुबारक दिन होता था और आज तन्हा है. मान गए वक़्त तुमको भी...
आखिरी बार जयपुर जाते वक़्त खिंची हुयी तस्वीर है ये. मन को यकीन हो चला था की फिर नहीं आना होगा यहाँ।
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