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delhi, India
I m a prsn who is positive abt evry aspect of life. There are many thngs I like 2 do, 2 see N 2 experience. I like 2 read,2 write;2 think,2 dream;2 talk, 2 listen. I like to see d sunrise in the mrng, I like 2 see d moonlight at ngt; I like 2 feel the music flowing on my face. I like 2 look at d clouds in the sky with a blank mind, I like 2 do thought exprimnt when I cannot sleep in the middle of the ngt. I like flowers in spring, rain in summer, leaves in autumn, freezy breez in winter. I like 2 be alone. that’s me
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Sunday, July 29, 2012

क्या तुम्हें याद है?


मेरी हमेशा से समय से पहले पहुंचने की आदत और तुम्हारी हमेशा देर से आने की आदत...हर मुलाकात में तुम्हारे देरी की शिकायत और नाराजगी। तुम हमेशा कहते तुम देर से क्यों नहीं पहुंचती, लड़कियां तो हमेशा इंतजार करवाती है। तुम्हारे डांट के डर से कितना भी जल्दी करूं फिर भी तुमसे पीछे ही रह जाता हूं। ...लेकिन इतने सालों में भी मै तुम्हारी आदत नहीं सुधार पाई।
तम्हें याद है वो दिन जब हमें लंच के लिए मिलना था...और घर से निकलने से पहले मैने बार-बार कहा था कि आज देर मत करना वरना मै इस बार रेस्टोरेंट के अंदर नहीं बाहर ही इंतजार करूंगी चाहे कुछ हो जाए...और तुमने कहा था अरे जान फिक्र मत करो बस उड़कर पहुंचता हूं तुम्हारे पास...तय समय पर मै पहुंच गई...लेकिन तुम तो हमेशा की तरह गायब थे...मैने भी ठान ली थी आज अंदर तो जाना नहीं है चाहे कुछ हो जाए।
थोड़ी देर बाद आसमान में काली घटाएं छाने लगी तेज बारिश होने वाली थी...मुझे पहुंचे अब आधा घंटा हो चुका था...मैने फोन निकाला और मिलाया, सीधा पूछा कहां हो? अब मै निकल रही हूं। तुमने कहा बस पहुंच गया हूं तुम्हारे लिए कुछ लेने गया था। अब तेज बारिश शुरू हो गई थी...लेकिन जिद में मै बाहर ही खड़ी होकर भीग रही थी, इतने में तुम आए, और तुम्हारा रटा हुआ डायलॉग बहुत देर से इंतजार कर रही हो ना माही? गुस्सा तो बहुत आ रहा था, तुम भी इस बात को समझ रहे थे। मैने गुस्से में पूछा मेरे लिए कुछ लाने में देर हुई ना क्या लाए दो मुझे....तुम मेरा हाथ पकड़कर थोड़ा आगे चले मेरे बैग से छतरी निकालकर खोली और बोले देखो जितनी बारिश की बूंदें हैं ना इतनी खुशियां लाया हूं तुम्हारे लिए...अब गिन लो तुम...इतना सुनते ही मेरे चेहरे पर बड़ी सी मुस्कान आ गई...क्या तुम्हें याद है अनगिनत बूंदों वाली खुशियां??

Monday, July 16, 2012

भीग रही थी यादों में...

clicked by: Mahi S 
तेज़ बारिश मानो मुझे अपने साथ कहीं ले जाना छह रही थी...बहुत दूर कहीं...छाता था साथ में, लेकिन बारिश की बूंदे उन दिनों के एहसास को जीने कह रही थीं. सच ही तो तेज़ हवाओं और आसमान से बरसते पानी ने सब कुछ याद दिला दिया. तुम्हारे साथ बारिश में भीगना।..जानबूझकर तेज़ बारिश में कार से बहार निकलना और मुझे भी बारिश में खींचना...घर की बालकोनी में खड़े होकर उजले आसमान को देखना और एक दुसरे की और देखकर बिना बोले ही मुस्कुराना...तुम्हारे बार बार ऑफिस से निकलने की जिद करना और मेरा कहना की कैसे आऊं बॉस मौसम की भाषा समझता ही नही है...फिर भी तुम्हारा घंटों ऑफिस के बहार मेरे लिए इंतज़ार करना..मेरे आने पर सीसीडी में साथ बैठकर कॉफ़ी पीना...घर लौटे वक़्त इंडिया गेट में हाथों में हाथ डाले टहलना और ठंडी हवा क बीच एक ही भुट्टे को खाना...कुछ ख़ास तो था उन दिनों में.....

और आज....

बारिश भी वहीँ है हम-तुम भी वही लेकिन बारिश की बातें महज़ एक sms से हो जाती है...फोन करके  थोड़ी बात...या फिर मेरे फोन करने पर तुम्हारा कहना थोडा बिजी हूँ अभी तुम्हे फोन करता हूँ।..और बाद में जब तुम्हारा फोन आता भी है तो बारिश की वो ठंडक उमस बन चुकी होती है....न तो वोह बालकोनी है न तुम दिल्ली में...तुम्हारा कहना ठीक है वक़्त क साथ रिश्ता मज़बूत होता है...चीज़ें बदलती हैं, गंभीर होती हैं...लेकिन मेरे लिए तो वक़्त वही था...बारिश.. इंडिया गेट.. कॉफ़ी.. इंतज़ार..भुट्टा...बालकोनी...कुछ तो ख़ास था उन दिनों में...या तो वक़्त ख़ास था या फिर बारिश!!!

Friday, May 11, 2012

वो दिन...


तेज हवा चल रही थी, हम दोनों अपनी पुराने सोसायटी शिप्रा सनसिटी में गाड़ी लगाकर वॉक कर रहे थे। मुझे लगा उसने गाड़ी सोसायटी में लगाई मॉल जाने के लिए क्योंकि उससे पहले बहुत झगड़ा हुआ था। लेकिन उसने गाड़ी सोसायटी में लगाने के बाद मुझे साथ लेकर उसी बिल्डिंग की तरफ चलने लगा जहां हमारा फ्लैट था। दोनों चुपचाप चल रहे थे...खामोशी से... जैसे-जैसे हम सोसायटी में बढ़ रहे थे मेरी आंखों में आंसू थमने का नाम नहीं ले रहे थे। शारिक बोला जब हम यहां थे तो वक्त कितना अच्छा था, दोनों एक दूसरे से मिलने का इंतजार करते थे, घूमते थे, हंसते थे और आज वक्त कितना बदल गया... आज एक-दूसरे की ओर देखते ही लग जाता है कि फिर एक घंटा झगड़ेंगे। मै चुप थी...कुछ नहीं बोल रही थी...बाहर तेज आंधी थी, तेज हवा चल रही थी, वैसा ही तूफान मेरे अंदर भी  चल रहा था।
दोनों चलते हुए अपने में ही खोए थे, दोनों ही उसके हर कोने को देखकर पुराने दिन याद कर रहे थे, अचानक वो ठिठका, मेरी नजर बिल्डिंग पर पड़ी मौलसिरी 6.... अंदर की हलचल मानो बाहर निकलने के लिए और बढ़ रही थी। हम दोनों ऊपर जाने लगे, ठीक अपने पुराने फ्लैट के पास आकर रूके...उसके दरवाजे को छुआ, फिर छत की तरफ बढऩे लगे। छत पर पहुंचकर उस कोने को देखकर मै खुद को नहीं रोक पाई... वो वही कोना था जहां हम शाम की चाय पीया करते थे, सर्दियों में धूप सेंका करते थे। मै रो रही थी, बुरी तरह से, जैसे पता नहीं मेरी जिंदगी से क्या गया हो...शायद सब कुछ...शारिक भी वहीं था, जब खुद को संभाला तो देखा आंखे उसकी भी नम थी...

Sunday, January 15, 2012

मूव ऑन...

deepika's 2days facebook status for me : 
जब जिंदगी ही ठहर गई है तो मै कैसे आगे बढ़ूं?
" Life is all about moving ahead...but sum ppl find it really difficult...a frend f mine is still trying her best to stay in that phase only. Dear, staying in love with someone even if you know you can't be together in future is like standing in rain... you know you will be sick but still you stand :( Move onnnnnnnnnnnnn...."

आज मेरी सबसे अच्छी दोस्त दीपिका ने फेसबुक में मेरे लिए मैसेज लिखा... मैसेज उसने इस गुस्से में लिखा कि क्यों मैने एक ऐसा एप्लीकेशन लिया जिसमें मै एक मैसेज छोड़ सकती हूं जो कि मेरे मरने के बाद फेसबुक पब्लिश करेगा। मैने भी उस एप्लीकेशन में एक मैसेज छोड़ा जो कि शायद मेरे मरने के बाद सबके सामने आए...खैर दीपिका के इस मैसेज को देखकर पहले कुछ रिएक्शन नहीं आया, फिर मुझे थोड़ी हंसी आई, फिर लगा जिंदगी के हर एक सच से हर इंसान वाकिफ होता है लेकिन जब उसे दूसरे को समझाना होता है तो आसान और खुद समझना होता है तो नामुमकिन हो जाता है। मूव ऑन बोलना सुनना कितना आसान है... मूव ऑन माही, मूव ऑन बेटा, मूव ऑन दोस्त, मूव ऑन बेबी मूव ऑन..मूव ऑन..मूव ऑन...
मै जानती हूं मुझे मूव ऑन बोलने वाला हर कोई मुझसे बहुत प्यार करता है, सोच रहा है मेरे बारे में कि कैसे मुश्किल जिंदगी हो सकती है मेरी... लेकिन क्या कोई माही को समझ रहा है?
कैसे करूं मूव ऑन...अपने पुराने फोन में मेरे और शारिक के एक दूसरे को जानने से भी पहले के मैसेज, पहली बार मिलने वाला दिन, पहली बार मिलने वाली जगह, पहली बार उसकी कार में बैठना (जो अब मेरी हो चुकी है), पहली बारिश, पहली बार उस फ्लैट में जाना जिसकी बॉलकनी को आज भी महसूस कर सकती हूं मै, पहली लड़ाई, पहली बार रूठना-मनाना, पहली बार बाइक में बैठना, मेट्रो स्टेशनों में शारिक का मेरे लिए इंतजार करना, घंटो मेरे ऑफिस के नीचे खड़े रहना और मेरे देर करने पर उसका अकेले जाकर टी-शर्ट खरीदना, पहली फिल्म, पहला तोहफा, पहली शॉपिंग, पहला बर्थडे, पहली बार मेरी फेवरेट आइक्रीम खाना, पहली बार मेरे लिए फूल, पहली तस्वीर, पहली रोक-टोक, पहला गुस्सा, पहली लांग ड्र्राइव, उसके दोस्तों से पहली बार मिलना, पहली बार मेरा उसे दीपिका को मिलाना, पहली बार उसके घर वालों से मिलना, घर वालों का प्यार, फिर उनका गुस्सा भी, सबकुछ ना जाने कितना कुछ....ना जाने कितनी ही बातें जो कि कागज में एक बार बैठकर उतारना ही संभव नहीं है। कैसे निकलूं? कैसे भूलूं दिल्ली और जयपुर के हर कोने को जहां हम न जाने कितने ही खूबसूरत पल गुजारते हैं, लड़ते हैं, गुस्सा होते हैं लेकिन फिर सारी बातें भूलकर आगे चलते हैं....
दीपिका मेरी जान मूव ऑन शब्द माही के लिए है ही नहीं.... जिंदगी उसके साथ या तो नहीं...

Thursday, September 15, 2011

अंदर-बाहर

अभी कुछ हफ्ते पहले शारिक साहब दिल्ली में थे। अपने ऑफिस की मीटिंग करने के बाद वो मुझसे मिलने आया। हम लोगों को थोड़ी खरीदारी करनी थी तो हम लोग एक मॉल में चले गए। मॉल में जाते ही पहले खाया-पिया फिर खरीदारी करनी शुरू  की। अक्सर हम दोनों जब साथ खरीदारी करने निकलते हैं तो शारिक खा-पीकर पहले फिट हो जाता है जिससे पूरी शॉपिंग के दौरान एनर्जी मिले। बहुत सारी शॉपिंग हुई उसमें मेरी कम उसकी ज्याद थी। घर के लिए भी कुछ सामान था, पर्दे, चादरें.....खैर उस दिन अच्छी शाम गुजरी। अच्छी शाम गुजरने से मतलब है किसी भी बात को लेकर हम दोनों की बहस नहीं हुई। शॉपिंग के बाद दोनों ही थक गए थे तो सोचा सीसीडी में बैठकर आराम से कॉफी पिया जाए। दोनों ही गए और अपनी-अपनी पसंद की कॉफी ऑडर की, इत्मीनान से बैठकर कॉफी पिया फिर मॉल से बाहर निकलने लगे। लेकिन घर जाने का मन दोनों का ही नहीं था। उसे दोबारा रात में लौटकर जयपुर जाना था। तो हम दोनों ही मॉल के बाहर बने चबूते में बैठ गए। यहां सीसीडी दिख रहा था, कुछ देर पहले अंदर हम-दोनों सीसीडी की जिस टेबल-कुर्सी पर बैठे थे अब वहां कोई और जोड आकर बैठा था। हम दोनों बातों में थे लेकिन दोनों का ही ध्यान अलग-अलग बार वहां जा रहा था। थोड्ी देर बाद बातें कब बंद हो गई हमें पता ही नहीं चला। अब हम चुपचाप उन लोगों को देख रहे थे। लड़का-लड़की ने अपने लिए कॉफी मंगाया फिर बात करने लगे। थोड़ी देर बाद लड़की ने लड़के को एक तोहफा निकालकर दिया। लड़के के चेहरे पर एकाएक मुस्कान आ गई। ये सब नजारा हम दोनों बाहर से बैठकर देख रहे थे। लड़के ने तोहफा खोला तो उसमें से एक घड़ी निकली, लड़के ने खुश होकर लड़की का हाथ चूमा... अभी मै इन दोनों को देखने में ही खोई हुई थी कि अचानक शारिक की आवाज आने लगी.... लेलो लेलो बेटा अब कुछ महीने बाद इसी घड़ी को दिखा-दिखाकर ताने मारे जाएंगे--पहले तो समय से पहले ही आते थे, अब दस मिनट का इंतजार भारी होता है, लंच में तुम्हारा फोन आता था अब तुम्हे फर्क ही नहीं पड़ता मैने खाना खाया या नहीं वगैरह..वगैरह..वगैरह...... शारिक की बात सुनकर मुझे भी हंसी आ गई। फिर शांत होकर चुपचाप एक बात बोला माही वक्त के साथ रिलेशनशिप मैच्योर हो जाता है बदलता नहीं है।

Friday, August 26, 2011

याद आई खुशी की वो पहली उड़ान


Aamer Palace Jaipur
आज अचानक वो दिन याद आ रहा है जब हर डर को पीछे छोड़कर मैने खुशी की पहली उड़ान भरी थी। पहली बार अकेले दिल्ली से बाहर जाने की हिम्मत की थी। पता नहीं क्या हुआ आज ऐसा, ऑफिस में काम करते हुए खिड़की से बाहर बरसते पानी को देखकर एकाएक वो सब याद आने लगा जब शारिक के दिल्ली छोड़कर जयपुर जाने के बाद मै पहली बार जयपुर गई। सच में बहुत हिम्मत वाला कदम उठाया था। बस तेज बारिश के साथ अचानक सब ऐसे सामने आ रहा था जैसे कोई फिल्म चल रही हो। 
हमेशा सुना करती थी प्यार कुछ भी करवा सकता है लेकिन हमेशा जेहन में एक ही बात आती थी कि क्या सच में ऐसा होता है। यकीन तब हुआ जब खुद इस एहसास को जिया। शारिक...मेरी जिंदगी...मेरी पूरी दुनिया। मेरी और शारिक की कहानी दिल्ली में शुरू हुई थी। दो अलग सोच के इंसान कब एक साथ चलने लगे पता ही नहीं चला। लेकिन अचानक शारिक को जयपुर शिफ्ट होना पड़ा। ये 2010 की बात है। दिल्ली छोड़कर जब वो जा रहा था जैसे अब कहानी यहीं खत्म हो जाएगी, लग रहा था पता नहीं सब कैसे चलेगा, कैसे मिलेंगे। मन बहुत उदास रहता था और जब भी हम मिलते थे तो सिर्फ उदासी होती थी। खैर शारिक फरवरी में जयपुर शिफ्ट हो गया। कुछ सप्ताह तो वो नियमित आता रहा लेकिन काम के दबाव में ये सिलसिला कम होता गया। एक दिन शारिक ने कहा तुम जयपुर आओ, खूब घूमेंगे फिरेंगे, मस्ती होगी। ये सब सुनकर अच्छा तो लग रहा था लेकिन समस्या थी कि जाऊं तो जाऊं कैसे। पहले कभी घर से अकेले बाहर नहीं गई थी, घर में क्या बताऊं, कैसे झूठ बोलूं वगैरह..वगैरह। लेकिन प्यार की ताकत ने सब डर को पीछे छोड़ दिया। एक सहेली के साथ प्लान बनाया और घर में बताया कि उसके दीदी के घर जयपुर जा रही हूं। प्लान के मुताबिकसब तय हो गया। शारिक के पटना से आए दोस्त मुनीर और काशिफ के भाई आमिर का भी मेरे साथ चलीने का प्लान बन गया। 24 अप्रैल 2010 था, शारिक की गुड्गांव मीटिंग थी तो तय हुआ कि शारिक हमें वहां से गाड़ी में ही ले जाएगा। पांच दिन घर से दूर अपनी दुनिया में जाने की खुशी को शायद ही मै शब्दों में बयां कर पाऊं। तय दिन मै, मुनीर और आमिर गुडग़ांव पहुंचे। अब शारिक की मीटिंग में इतनी देर हुई कि सुबह के पहुंचे हमें रात हो गई। खैर जो भी हुआ खाना खाने के बाद रात करीब 8 बजे हम गुडग़ांव से चले और सफर शुरू हुआ जयपुर का। रास्तेभर दोस्तों के साथ मौज-मस्ती, यकीन ही नहीं हो रहा था मै शारिक के साथ इतनी रात को। सबकुछ खुशनुमां लग रहा था, रोजमर्रा की घड़ी के साथ  वाली जिंदगी बहुत पीछे छूट गई थी। देर रात ढाबे में खाना खाया, गाना गया और इस तरह दिल्ली से जयुपर का 6 घंटे का सफर हमने 8 घंटे में पूरा किया। हम रात के 3 बजे करीब जयपुर पहुंचे।  जिसको जहां जगह मिली वहां सो गए। अगले दिन जब सुबह आंख  खुली तो यकीन ही नहीं हुआ कि मै दिल्ली में नहीं हूं। 
वैसे घर से दूर शारिक के साथ का वो वक्त मुझे बहुत भा रहा था। एकदम आजाद, उन्मुक्त जिंदगी, न सोने का समय न खाने और न ही समय की कोई पाबंदी। बस सुबह से जो हम लोगों का दिन शुरू होता आधी रात को जाकर खत्म होता। इस बीच सबसे बड़ी मुश्किल होती घर में मम्मी को फोन करना, इसके लिए पूरा माहौल तैयार करना पड़ता था। एक फोन करने के बाद पूरे दिन उनका एक भी फोन नहीं आता। उन पांच दिनों में मैने पूरा जयपुर देख लिया। एक बात जो आज भी मुझे याद आती है, एक शाम हम बाहर घूम रहे थे, शारिक मुझसे अचानक बोला आज शाम पहले से ज्यादा अच्छी लग रही है। सच में खूबसूरत लग रही थी वो शाम, इतने लोगों के बीच में हम अपनी ही दुनिया में थे। 

Saturday, August 6, 2011

दिल्ली की बारिश और यादें

 mansarover flat's main gate, jaipur
दिल्ली की बारिश की बात ही कुछ और है. हालाँकि दिल्ली में बारिश अब नाम के लिए ही रह गयी है लेकिन फिर भी यहाँ के हर मौसम की अपनी ही खासियत है. एक अजीब सी मोहब्बत है इस मौसम से, बारिश की अपनी ही बात है, सब कुछ उजला, धुला हुआ, और जब बारिश की बूँदें चेहरे को छूती है तो मनो इसका संगीत एक नई ताजगी देता है. हर बरसात के साथ जुडी कुछ ख़ास याद. स्कूल, कॉलेज, ऑफिस हर दौर की कुछ कुछ बातें जो हमेशा ही याद आती है. बचपन में बारिश के पानी को जमा करके उसमें नाव चलाना तो कॉलेज के दिनों में क्लास बंक करके दोस्तों के संग मौज-मस्ती, सड़क किनारे जमा पानी में छई-छप-छई तोह घंटो बारिश में बस स्टॉप में बैठना. इन सब मस्ती के बाद भी मै बारिश के साथ एक ख़ास वक़्त बिताती थी. लेकिन अब वक़्त के साथ सब कुछ छूटता जा रहा है. आज भी बारिश तो होती है लेकिन मौज मस्ती के नाम पर ऑफिस का अपना डेस्क, किताबें, चाय और खिड़की से बहार बरसते पानी का नज़ारा. दिल्ली की भाग-दौड़ वाली ज़िन्दगी में अब फुर्सत के पल कहीं बहुत पीछे छूटते रहे हैं. लें आज भी अगर मौका मिलता है तो मै अपना बैग लिए इंडिया गाते की ओर चल देती हूँ, खुद के साथ थोडा वक़्त बिताने के लिए. सड़क किनारे बच्चों को बारिश में खेलता देख, स्कूल से घर जाते बच्चों को देख, कॉलेज के स्टुडेंट्स को बस स्टैंड में देख वो दिन याद आ जाते हैं. इस तरह चलते-चलते कई बातें आँखों के सामने आती हैं, छोटी-छोटी खुशियाँ आज भी चेरे पर मुस्कान ले आती है. फिर अचानक एहसास होता है न जाने वो वक़्त कहाँ खो गया है. पहले कुछ नहीं होता था लेकिन ढेर सारी खुशियाँ होती थी, आज सब कुछ है लेकिन खुश होने के लिए कुछ नहीं है. ज़िन्दगी इतनी उलझ गयी है की पता ही नहीं है क्या हो रहा है. अब सब कुछ बदल गया है, हमेशा कुछ खोने का डर, वक़्त एक जैसा न होने का दुःख, सब कुछ पहले जैसा न होने की एक खीज है. लगता है वक़्त एकबार फिर पीछे चला जाये. बस ज़िन्दगी खुलकर जीने का मन है, ऐसे जीने का जैसे कल सब ख़तम हो जाएगा, सिर्फ आजभर का वक़्त है. 

Friday, August 5, 2011

पता नहीं वक़्त बदलता है या लोग

वक़्त तो तेज़ी से बढ़ रहा है लेकिन समझ ही नहीं आता है की वक़्त बदलता है या लोग? इस बात को लेकर मेरे और शारिक के बीच न जाने कितनी ही बहस होती है, उसका कहना होता है की वक़्त के साथ रिश्ते गंभीर होते हैं तो मुझे लगता है लोग बदलते हैं. बदलाव चाहे जिमेदारियों की वजह से आये या फिर काम की वजह से बदलाव तो आते ही हैं. अब मै आपको  2 अगस्त का किस्सा सुनाती हूँ. यह हमारी एनिवेर्सेरी है, हर साल की तरह मुझे इंतज़ार की साहब मुझे फ़ोन करेंगे, हम लोग बात करेंगे और एक बार फिर पुराने दिन को याद करेंगे. इन सब बातों के साथ मेरे दिन की शुरुआत हुई. सुबह मै तैयार हुयी और मैंने वही कपडे पहने जो कभी मै उससे पहली बार मिलने पर पहने थे. अच्छा लग रहा था, सुबह से मई बहुत कुश भी थी. लेकिन मेरी ख़ुशी दोपहर तक गायब हो रही थी. मेरी नज़रें सिर्फ और सिर्फ फ़ोन पर थी. लेकिन 2 बजे तक भी शारिक ने कोई फ़ोन नहीं किया तो मैंने ही हार कर उसे एक sms किया..sms में लिखा " happy 2 august..love u n thnx for not remembering the day" थोड़ी देर बाद उसका भी जवाब आया; लेकिन अब भी उसके पास इतनी फुर्सत नहीं थी की वो एक फ़ोन करे. गुस्सा तो बहुत आ रहा था पर उससे भी ज्यादा वो सब बातें याद आ रही थी जहाँ से सब कुछ शुरू हुआ था. 
अब मेरा ऑफिस भी नॉएडा हो गया है. मेरी और शारिक की कहानी भी यहीं आस पास से शुरू हुई थी. शारिक शिप्रा सनसिटी में रहता था. बस काम में मन ही नहीं लग रहा था. थोड़ी देर सीट में बैठने के बाद मै ऑफिस की छतपर चली जाती. इस ऑफिस की छत से सनसिटी साफ़ नज़र आता है. बस चाय की चुस्की और हलकी बारिश में मै मनो फ्लाश्बैक में चली गयी थी. ज़िन्दगी का सबसे खूबसूरत वक़्त मनो उन कुछ घंटो में मैंने देखा.  मन कर रहा था वक़्त एक बार फिर पीछे चले जाये और मै उस ज़िन्दगी को एक बार फिर से जे लूँ. सनसिटी के वो दिन बहुत याद आते हैं आज भी. वो इत्मीनान, वो सुकून, वो ख़ुशी, वो पल आज चाह कर भी नहीं मिल सकते हैं. खैर जैसे तैसे शाम तोह गुज़री लेकिन उदास होने के साथ ही गुस्सा भी बहुत आ रहा था. लग रहा था फ़ोन करके खूब झगडा करूँ फ़ोन भी किया, झगडा शुरू भी हुआ लेकिन रोज़ा चलने की वजह से ज्यादा नहीं झगड़ी.
परेशान मै बस सुकून ढून्ढ रही थी, मैंने ऑफिस से ऑटो किया और सीधा आनंद विहार आ गयी. पहले सोचा घर जून, फिर मन में आया क्या हुआ अगर शारिक साथ नहीं है तो, मै तोह उस जगह जा ही सकती हूँ जहाँ हम मिले. मै ऑटो से उतरकर सीधा edm mall आ गयी. मैंने वहां straberry crush icecream लिया और जाकर उस्सी जगह में बैठ गयी जहाँ मै और शारिक जाया करते थे. एक बार फिर वही सब आँखों के सामने से गुज़र रहा था. मैंने शारिक को फ़ोन किया, और पूछा सिर्फ एक बात बता दो शायद यही सुनकर थोडा ठीक लगे, सिर्फ इतना बता दो की वक़्त बदलता है लोग ? लेकिन उसकी तरफ से कुछ जवाब नहीं आया, अक्सर ऐसे जवाब शारिक हमेशा देने से बचता है. लेकिन मेरे सच में कोई बताये वक़्त बदलता है या लोग???