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delhi, India
I m a prsn who is positive abt evry aspect of life. There are many thngs I like 2 do, 2 see N 2 experience. I like 2 read,2 write;2 think,2 dream;2 talk, 2 listen. I like to see d sunrise in the mrng, I like 2 see d moonlight at ngt; I like 2 feel the music flowing on my face. I like 2 look at d clouds in the sky with a blank mind, I like 2 do thought exprimnt when I cannot sleep in the middle of the ngt. I like flowers in spring, rain in summer, leaves in autumn, freezy breez in winter. I like 2 be alone. that’s me
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Wednesday, October 16, 2013

...चंद आखिरी पन्‍ने लिख रही हूं

वॉल्‍वो से ली हुई एक पुरानी तस्‍वीर Delhi-jaipur highway
लग रहा है जैसे कुछ आखिरी पन्‍ने लिख रही हूं, जिंदगी के आखिरी पन्‍ने. हां, अधूरे, बेतरतीब से, सच्‍चे, झूठे...टूटे ख्‍वाबों को समेटते हुए लंबा वक्‍त गुजर गया, लेकिन कसक है कि जाती ही नहीं.
आज सुबह से नजरें फोन पर थी, मुबारकबाद सुनने के लिए, एक सलाम के लिए, एक सलाम का जवाब सुनने के लिए. ईद जो थी, इंतजार अब खत्‍म हुआ, लेकिन मायूसी के साथ क्‍योंकि ना फोन बजा, ना मुबारकबाद आई.

कॉफी का कप लेकर जब शाम को खिड़की के पास बैठी तो कुछ महीने पहले तुमसे हुई मुलाकात याद आई. वो मुलाकात जो आठ महीने बाद हुई, वो मुलाकात जो ना कभी दिल से जाएगी और ना नजरों से. 25 अगस्‍त रात को तुम्‍हारा एक मैसेज आया. 'कल दिल्‍ली आ रहा हूं और तुम्‍हे मुझसे थोड़ी देर के लिए मिलने आना होगा. तुम्‍हारा ज्‍यादा वक्‍त नहीं लूंगा, जरूरी काम है प्‍लीज आ जाना.'

ये मैसेज पढ़कर कुछ देर के लिए सांस ही नहीं आई, हाथ-पैर भी ऐसे कांपे जैसे ना जाने क्‍या सुन लिया. दिल फफक-फफक कर रो रहा था, कह रहा था, 'बिना सोचे समझे चली जा.' लेकिन दिमाग ने मना कर दिया. मैने मैसेज लिखा, नहीं आ पाऊंगी, एक बार फिर तुम्‍हे जाते नहीं देख सकती. माफ कर दो, मै नहीं आऊंगी.' ऊधर से तुम्‍हारा मैसेज आया, मीटिंग के लिए आ रहा हूं, गुड़गांव में है, एमजी रोड मेट्रो स्‍टेशन में शाम 5 बजे.'
तुम जानते थे मै आऊंगी, हमेशा की तरह, बिना सोचे समझे, दौड़कर आऊंगी. दिल और दिमाग की कश्‍मकश में रात आंखों में ही गुजर गई. सुबह 6 बजे ऑफिस के लिए भी निकल गई, मॉर्निंग शिफ्ट थी. पूरा दिन तुम्‍हारा कोई फोन नहीं आया था. शायद तुम जानते थे कि मै जरूर पहुंची.

ऑफिस से निकल गई थी, लेकिन घर का रास्‍ता पकड़ने की बजाय मेट्रो लिया. दिल, दिमाग से जीत चुका था, मै तुम्‍हारे पास आने के लिए निकल पड़ी थी. कुछ देर बाद मै एमजी रोड के मेट्रो स्‍टेशन में थी, तुम्‍हारा फोन आया, 'मुझे आने में थोड़ी देर हो जाएगी. तुम थोड़ा इंतजार करना.' मैने धीरे से पूछा, 'तुम इतने यकीन के साथ कैसे कह रहे हो कि मै पहुंच गई हूं?' तुमने जवाब दिया, 'क्‍योंकि तुम माही हो.' इतना कहकर तुमने फोन काट दिया.

थोड़ी देर बाद फिर फोन आया, 'किस गेट पर हो?' इतना सुनकर अब मेरा दिल जोर-जोर से धड़क रहा था, क्‍योंकि आठ महीने बाद तुम्‍हारा चेहरा देखूंगी. मैने कहा, 'गेट नंबर 2. मै वहीं ऊपर सीढि़यों पर खड़ी थी, तुम सामने से पैदल चलकर आ रहे थे, अब आखिरी सीढ़ी पर तुम थे और पहली सीढ़ी पर मै. उन चंद सीढि़यों के बीच से गुजरे इतने साल सरसराकर निकल रहे थे. ना तुम ऊपर आ रहे थे और ना मै नीचे. वहीं से हम दोनों एकदूसरे को देख रहे थे, थाड़ी देर बाद मै नीचे आई. दिल कर रहा था एक बार गले लग जाऊं, बिल्‍कुल पहले की तरह पर शायद बहुत कुछ बदल चुका था या शायद मुझे लग रहा था.

तुम्‍हारी आंखों में नमी थी, पूछा तुमने मुझसे, 'कैसी हो माही?' मै देखा नहीं तुम्‍हारी ओर क्‍योंकि जानती थी मै कि नहीं संभाल पाऊंगी खुदको. हम मेट्रो स्‍टेशन पर ही बने कॉफी कैफे डे में गए. तुमने कॉफी ऑर्डर की, मेरी पसंद की कॉफी, ब्‍लैक कॉफी, लेकिन सिर्फ एक कप. तुमने ही कॉफी में शक्‍कर मिलाई, बिल्‍कुल थोड़ी, जैसा मै पीती हूं. फिर कप उठाकर मुझे दिया. मै चाह कर भी खुद को नहीं रोक पाई, मै रो रही थी और आंसू इतने थे कि थमने का नाम ही नहीं ले रहे थे.

थोड़ी देर बाद तुमने मुझसे कहा, 'माही, मै तुम्‍हारा गुनहगार हूं. मै जानता हूं मैने क्‍या किया है और मुझे जिंदगीभर इस बात का अफसोस रहेगा, लेकिन तुम्‍हे आज देखकर मुझे अपने आप से आज और नफरत हो गई है. क्‍योंकि तुम्‍हारी आंखों में मै वहीं देख रहा हूं जो आठ महीने पहले आखिरी बार मिलते हुए देखा था. मुझे दिल से माफ कर दो माही.' गलती तो हो गई तुमसे, ना अब हम एकदूसरे की जिंदगी में कभी शामिल नहीं हो सकते.

हम दोनों के दर्मियां सिर्फ खामोशी थी. तुमने मुझसे पूछा, 'क्‍या मै एक सिप कॉफी इससे पी सकता हूं?' मैने हामी में सिर हिलाया, तुमने कॉफी का एक सिप पीया. मै बिना तुम्‍हारी ओर देखे, उठकर चली गई.

Friday, August 2, 2013

फिर वही तारीख है, पर तुम नहीं हो- 2 August!

कलेंडर के पन्ने घूम कर फिर उसी तारीख पर आ गए, पर देखो ना तुम आसपास हो ही नहीं, कुछ नहीं कहना आज, चुप रहना है. पर यादें उनका क्या करूँ, हज़ार मना करने पर भी सामने आ जाते है. कभी ये मुबारक दिन होता था और आज तन्हा है. मान गए वक़्त तुमको भी...













आखिरी बार जयपुर जाते वक़्त खिंची हुयी तस्वीर है ये. मन को यकीन हो चला था की फिर नहीं आना होगा यहाँ।
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Thursday, June 20, 2013

बेलुत्‍फ जिंदगी, अधूरे ख्‍वाब और तुम...

 Break up Party का केक 
यूं तो सब खास रहा, लेकिन छूटते हुए लम्‍हों को यूं ही नहीं जाने देना चाहती थी मै... ये मेरे थे...सिर्फ मेरे...आखिरी बार जयपुर का सफर, आखिरी कुछ लम्‍हे, वो पल, वो दर्द, वो चुभन, वो घुटन, वो कसक...सब कुछ मेरा था. मैने हर लम्‍हे को कैद किया, अपने पास हमेशा रखने के लिए. दिल्‍ली लौटने के पहले हमने सब कुछ दोराया,  दोहराया, जयपुर के हर कोने को फिर से जीया और उस आखिरी दिन फैमिली डिनर के लिए भी गए.

 वो डिनर सच में खास लग रहा था
, सब अच्‍छे से तैयार हुए थे, मै, तुम, तुम्‍हरा भाई और हमारा सबसे अजीज Mr. K, जयपुर के Barbeque Nation में था ये खास डिनर. Break up Party...

केक काटते हुए हम..

Barbeque Nation स्‍पेशल
सब कुछ पास रहेगा यादों में भी तस्‍वीरों में भी....











तस्‍वीरें तब और खास हो जाती है जब उसमें दिखने वाले लोग साथ नहीं होते...







ख्‍वाहिशों का क्‍या है, ख्‍वाहिशें तो होती ही हैं अधूरी रह ने के लिए...
Life is strange when happiness makes u sad... :(

Saturday, February 9, 2013

....मुझे याद करोगे ना, इस रिश्‍ते पर नाज करोगे ना


खालीपन है, एकदम खाली...दिल, दिमाग और जिंदगी. इस खालीपन के साथ जिंदगी जीने की हर रोज एक नई कोशिश करती हूं और शाम होते-होते हार जाती हूं. क्‍या तुम भी ऐसी कोशिश कर रहे हो, क्‍या खालीपन तुम्‍हारे जेहन में भी दस्‍तक देता होगा? पता नहीं इतनी दूर हूं ना तुमसे अब....
अब तक तुम्‍हारे साथ थी लेकिन अभी तुम्‍हें जी रही हूं मै...हर दिन, हर घंटे, हर पल...कभी समझने का मौका ही नहीं मिला कि जिंदगी तुम्‍हारे बिना भी जीनी होगी, खुद को बहलाने के लिए हर खुशनुमा पल को याद करती हूं.
 तुम्‍हें याद है एक दिन रात खाने के बाद हम सब बैठे थे, हमारा सबसे अजीज Mr. K भी हमारे साथ ही था. बातों-बातों में उसने पूछा माही तुम्‍हें दोबारा जिंदगी मिली तो तुम्‍हें क्‍या चाहोगी? तुम मेरी ओर देखकर मुस्‍कुराए....यही सवाल उसने तुमसे भी पूछा....तुमने एकदम कॉरपोरेट जगत के किसी बड़े नाम की तरह एक जवाब दिया...अब बारी मेरी थी...Mr. K ने दो बार कहा, बोलो ना माही अल्‍लाहताला ने दोबारा इंसानी जिंदगी दी तो तुम क्‍या जीना चाहोगी.
.....और मै बोली....मै माही ही बनकर आना चाहूंगी, हर वो गलती दोबारा दोहराना चाहूंगी, तुम्‍हें इतना ही प्‍यार करूंगी, तुम्‍हारे साथ जिंदगीभर साथ रहने के लिए इसी तरह अल्‍लाह से लड़ूंगी, तुम्‍हारी हर छोटी-बड़ी बात का ख्‍याल रखूंगी, अपने मां-पापा की खिदमत करूंगी. मै तुमसे इसी तरह टूट कर प्‍यार करूंगी...जिंदगीभर, जिंदगी रहते तक और जिंदगी के बाद भी...इंशाल्‍लाह...ये सुनकर मेरा गला रूंध गया था...तुम दोनों की आंख भी नम थी.... Mr. K उठकर पानी लेने गए....तुम मेरे पास आए और पूछा इतना प्‍यार क्‍यों करती हो मुझसे...शायद तुम्‍हें कुछ नहीं दे पाऊंगा....
तुम्‍हारे ही ख्‍यालों से बात करते हुए उसी जगह आ खड़ी हूं जहां तुमने मुझे आखिरी बार छोड़ा था....न्‍यू फ्रेंड्स कॉलोनी का ये बस स्‍टैंड....तुम नहीं हो लेकिन मेरा दिल पूछना चाहता है तुमसे ''....मुझे याद करोगे ना, इस रिश्‍ते पर नाज करोगे ना?


रंजिश ही सही, दिल ही दुखाने के लिए आ
आ फिर से मुझे छोड़ के जाने के लिए आ.......अहमद फ़राज़

Sunday, December 23, 2012

आखिर नहीं लड़ पाई मै...


jodhpur, clicked by Mahi S
रास्‍ते शायद अगल हो चुके थे अब....दिल का पता नहीं...तुम्‍हारे दिल का!  कभी कुछ था भी या नहीं इस बात पर भी शक होता है. सब हिम्‍मत जुटाकर सिर्फ इतना बोल पाई कि ज्‍यादा से ज्‍यादा वक्‍त मेरे साथ रहो..क्‍या तुम इतना कर सकते हो मेरे लिए? हमेशा की तरह तुम्‍हारे पास मेरे लिए खामोशी ही थी...इस बार तुम्‍हारा जवाब जानना मुझे जरूरी नहीं लगा क्‍योंकि मेरा दिल मान चुका था मै अब जो कर रही हूं वो अपने लिए कर रही हूं. 
खराब तो था ही सब, लंबे समय से....साथ होकर भी अलग ही थे. लेकिन इस बार तुम्‍हें बताकर जयपुर आई थी मै. बोला था मैने इस बार बाहर चलेंगे कहीं. पता नहीं कितने समय बाद तुमने बात नहीं काटी थी मेरी. एक बार में ही कहा ठीक है, जोधपुर ले चलूंगा तुम्‍हें. मै हमेशा की तरह ऑफिस के बाद जयपुर के लिए निकली. रास्‍ते में तुमसे बात भी हुई लेकिन पता नहीं क्‍यों खालीपन लग रहा था मुझे....शायद मेरे मन का खलल था. तुमने कहा, 'मै तुम्‍हारे पहुंचने से पहले ही सिंधी कैंप पहुंच जाऊंगा.' मै अब भी सिर्फ तुम्‍हें स सुनना ही चाह रही थी, देखना चाहती थी क्‍या-क्‍या बोल सकते हो तुम.... 
मै सिंधी कैंप पहुंच गई थी, रात के साढ़े ग्‍यारह बजे थे. तुम पहले ही वहां थे, हाथ में जोधपुर की दो वॉल्‍वो की टिकट के साथ. तुम मेरी ओर बढ़े...मेरे हाथ में एक किताब थी...रविंदर सिंह की 'कैन लव हैपन ट्वाइस'... तुम पास आए...मुझे देखा, किताब को देखा...फिर बोले...'तुम्‍हे नहीं हो सकता'...तुम्‍हारी इस बात से मेरे चेहरे पर मुस्‍कुराहट तो आई लेकिन वो एक सवाल था, फिर भी तुमने मुझे.... 

clicked by Mahi S
तुम्‍हारे हाथ में कप नूडल था, तुमने मुझे दिया और बोले मुझे पता है तुमने रास्‍ते में कुछ नहीं खाया होगा..ये नूडल खा लो... तुम्‍हारी ये फिक्र देखकर मुझे अजीब लग रहा था. हम दोनों वॉल्‍वो में बैठ गए. पहली बार मै घर में जाने से पहले जयपुर से कहीं और के लिए निकली थी....छह घंटे के बाद जब आंख खुली तो एक और नया शहर हम दोनों का स्‍वागत कर रहा था.... जोधपुर की वो सुबह बहुत खास थी और मै तुम्‍हारे साथ....शायद और कुछ दिन के लिए...होटल के कमरे की खिड़की से जब पर्दा हटाया तो आंखों को एक सुकून मिला, नीला खुला आसमान और ऊंची पहाड़ी....मै अकेले खड़ी थी, हमेशा के लिए अकेले...सोच रही थी जिंदगी कैसी होगी तुम्‍हारे बिना...आखिर नहीं लड़ पाई ना नियति से ना ही तुमसे..... 

Wednesday, November 28, 2012

चल पड़ी थी फिर दूर कहीं...


clicked by Mr. S
अजीब खबर सुनने को मिली उस दिन, सुनकर अनसुना करना चाहा लेकिन शायद खबर सच थी.
तुम्‍हें फोन लगाना चाहती थी पर मैने नहीं किया. दोपहर को ही ऑफिस से निकल गई थी...दूर कहीं....कश्‍मकश थी मन में क्‍या बात करूं...क्‍या पूछूं तुमसे...अजीब सी दूरी महसूस हो रही थी तुमसे...पता नहीं कैसा अजनबी एहसास था तुम्‍हें लेकर...इतने सालों में पहली बार...
शाम को मैने फोन मिलाया तुम्‍हें, फोन उठाया तुमने लेकिन आवाज भी अपनी सी नहीं लग रही थी मुझे. पता नहीं क्‍या था...आखिर तुमसे पूछ ही लिया मैने...खामोशी थी फोन में...हम दोनों के दर्मियां भी था अजनबी एहसास और खामोशी. काफी देर बाद बस एक आवाज आई...'अब समझो माही'. तुम्‍हारा इतना कहना ही मेरा जवाब था..
कुछ नहीं बोली मै तुमसे...फोन रख दिया मैने. तुम वो थे ही नहीं जिसने मुझे माही बनाया...मै तो किसी अजनबी से बात कर रही थी. तुम अपना ले चुके थे, तुम्‍हारा फैसला था, मै कहीं नहीं थी उस फैसले में...अंगुलियों में दिन गिनने लगी थी, जेहन में एक ही बात आई 'ना जाने तुम्‍हारे साथ बिताने के लिए कितने दिन हैं मेरे पास'.
फोन लगातार बज रहा था....नहीं उठाना चाहती थी फोन...क्‍या सुनने के लिए उठाती कि अब रास्‍ते अलग होंगे...चल पड़ी थी फिर दूर कहीं...

Friday, November 16, 2012

खो गया अक्स, खो गए अलफ़ाज़

@ Bhangarh
मुझे याद आ रहा है, उस दिन जब तुम शाम को ऑफिस से लौटे थे और मै तुम्हे पानी देने के बाद दिन भर की साडी बातें तुम्हे एक ही सांस में बता रही थी। बिना तुम्हारी तरफ देखे, मै सिर्फ बोली जा रही थी। शौपिंग में आज इतना डिस्काउंट मिला, घर की साडी ग्रोसरी ललकार आई, एक लाल रंग का दुप्पटा लिया, ड्राईवर देर से आया, नीचे के फ्लैट में नयी फॅमिली आई है उनसे दोस्ती हुयी, उन्हें मैंने शाम को चाय पर बुलाया...तुम हमेशा की तरह मेरी बातें सुन रहे थे।
 मेरी बातों को बीच में रोकर तुमने मुझे एक कप चाय बनाने को कहा। मै चाय बनाने चली गयी, चाय लेकर आई तो तुम अख़बार लेकर बैठे थे, मै छह रही थी तुम मुझसे बात करो। मैंने तुम्हे बोला भी "क्या तुम चाय और अख़बार लेकर बैठ गए, मुझसे बात करो, सुनो न ठीक से मैंने पुरे दिन क्या किया।" पर तुम तो बस सिर हिलाकर जवाब दिया। मुझे अच्छा नही लगा, मै उठकर चली गयी। आईने के सामने मई तैयार हो रही थी, काजल उठाकर अभी लगा ही रही थी की आईने में तुम नज़र आये। मैंने भी तुम्हे अनदेखा किया और अपनी आँखों में काजल लगाने लगी। तुम मेरे करीब आये, मुझे धीरे से अपने पास खींचा, मैंने तुम्हारी तरफ नाराज़गी से देखा, फिर तुमने धीरे से मेरे कान में कहा "माही, तुम जब अपनी इन काजल वाली आँखों से मेरी तरफ देखती हो ना तो मुझे साडी बातें समझ आ जाती है...तुम्हारी बातें समझने के लिए मुझे अल्फाजों की ज़रूरत नहीं है। 


आज 
आज मै आईने के सामने हूँ, काजल लगा रही हूँ लेकिन आज मेरी आँखों की तारीफ करने के लिए ढूँढने पर भी तुम्हारा अक्स आईने में नज़र नहीं आ रहा है। काजल आज भी लगा रही हूँ.... क्यूंकि तुम्हे पसंद है मेरी काजल लगी आँखें....तारीफ करने के लिए तुम नहीं हो, लेकिन काजल से कह रही हूँ "मेरी आँखों में ऐसे रहना की किसी को मेरी सूजी आँखें ना दिखे। आज ना तुम्हारा अक्स है ना तुम्हारे अलफ़ाज़। 

Monday, September 10, 2012

वो टुकड़ा धूप का...


मैने सुबह उठते ही घर के सारे दरवाजे खिड़की खोल दिए थे, कुछ देर बाद ही तेज हवा घर से आर पार हो रही थी। हवा का पर्र्दों के साथ लुका-छिपी का खेल चल रहा था पूरे घर में, खिड़की और बॉलकोनी में लगे विंड चाइम भी हवा के साथ अठखेलियां कर रहे थे। तुम्हारा मूड उस दिन बहुत अच्छा था और मेरा खराब, पता नहीं उदासी लग रही थी उस सुबह में मुझे। तुम ऑफिस चले गए, मैने भी कुछ नहीं कहा था, ज्यादा बात भी नहीं की।
बेचैनी को समझ नहीं पा रही थी..किताबों के साथ बैठ गई दिल बहलाने सोफे पर ही बैठे आंख लग गई। उस दिन तुम जल्दी आ गए थे घर, मै चुप थी, तुमने भी मुझसे कुछ खास बात करने की कोशिश नहीं की। काफी देर हो गई थी अब, तुम्हे देखने बेडरूम की तरफ गई, खिड़की खुली थी, धूप का एक टुकड़ा अंदर झांक रहा था, लेकिन थोड़ी-थोड़ी देर में टुकड़ा छोटा हो रहा था। तुम वहीं बेड पर खामोशी से बैठे थे, मै वहीं पास जाकर बैठ गई तुम्हारे...थोड़ी देर बैठे रहे दोनों...चुपचाप... तुम थोड़ी देर बाद उठे, तुमने अपना हाथ दिया और मुझे डांस के लिए बुलाया मै कुछ समझ नहीं पाई। तुम उसी धूप के टुकड़े पास ले गए मुझे जो धीरे-धीरे छोटा हो रहा था। अचानक मेरे कान में तुमने धीरे से कहा, हमें इसी टुकड़े पर डांस करना है ये जितना छोटा होगा, हम उतने ही पास होंगे। मै सिर्फ तुम्हें देख रही थी और उस धूप के टुकड़े को भी, लग रहा था मानों दोनों ने साथ में तैयारी की थी। अब टुकड़ा बहुत छोटा हो गया था और हम दोनों बहुत पास थे, एक-दूसरे को ऐसे देख रहे थे जैसे पहले कभी नहीं देखा हो। तुम अचानक बोले मुस्कुरा के जल्दी से बॉय बोलो इस धूप के टुकड़े को नहीं तो नाराज होकर कल आएगा नहीं....मैने देखा सच में एक लकीर भर थी अब जो किसी भी वक्त ओझल हो जाती...दोनों मुस्कुराए...वो टुकड़ा हमें साथ में छोड़कर चला गया था...

Tuesday, August 28, 2012

आईने ने कैद किया अक्स


दिन गुजर रहे हैं अपनी रफ्तार से, वक्त है कि मेरे लिए रूक ही नहीं रहा है। आसपास से सब गुजर रहा है लेकिन मेरे लिए सब कुछ जैसे ठहरा है। कुछ खोई चीजों को ढूंढ़ते हुए इतना दूर निकल आई हूं कि रास्ता ही नहीं मिल रहा है बाहर निकलने का । किस्से पूछूं रास्ता? दूर चली जा रही हूं एक रौशनी के पीछे, छलावा है शायद वो, जितना आगे बढ़ रही हूं वो रौशनी उतनी ही आगे जा रही है। हथेली फैलाओ तो हाथ में है और हथेली बंद करो तो बाहर। थक गई हूं अब, और ये रास्ता है तो तय होने का नाम ही नहीं ले रहा है। दिन ढल रहा है, आज भी रास्ता नहीं मिला बाहर निकलने का! एक जगह लेकर बैठ गई हूं खामोशी से, एक उम्मीद के साथ। लेकिन थकी हुई आंखों को कुछ धुंधला अक्स दिख रहा है, हमारा-तुम्हारा अक्स, मुस्कुराते हुए आइने के सामने, कैद करते हुए कुछ खुश लम्हों को, खिलखिलाते हुए, एक दूसरे के साथ.... शायद आईने ने ही कैद कर लिया वो अक्स....बदमाश कहीं का...तभी तो आज आईने के सामने हूं तो थकी आंखे, खामोश चेहरा और आईने के भीतर वही रौशनी दिख रही है।

Sunday, August 5, 2012

इंशाल्लाह...

clicked by: Mahi S
Mahi : सुनो ना एक राइटिंग कॉम्पीटीशन है, उसमें लव स्टोरी लिखनी है, आखिरी तारीख अभी कुछ दिन में ही है प्लीज तुम लिखो ना हमारी कहानी...प्लीज...
S : हां हां ठीक है...मै कोशिश करूंगा...लेकिन अच्छा लिख पाऊंगा या नहीं ये नहीं पता।
Mahi :  तुम लिखो तो सही हमारी लव स्टोरी सबसे अच्छी होगी।
S : सबको ऐसा लगता है कि उनकी लव स्टोरी बेस्ट है। तुम भी ना...
Mahi :  मुझे नहीं पता तुम लिखकर जल्दी से मेल कर दो।
S : क्या लिखूं कि कहानी की हीरोइन ये मानने को ही तैयार नहीं है कि कुछ रिश्ते साथ रहने के लिए नहीं बनते??
Mahi : नहीं...वहीं से शुरू करो तुम्हारा ऑफिस..दीदी का डेस्क...उसकी शादी की तस्वीर और तस्वीर देखकर तुम्हारा मुझे एक अंजान बनकर फोन करना। :)
S : फिर परियों की दुनिया में दोनों का रहना और हकीकत सामने आने उसे न मानने की जिद करना...
Mahi : काश ऐसा हो कि जैसे-जैसे तुम्हारा पेन चले और कहानी सच में वैसी ही चले। और कहानी का अंत हो कबूल है..कबूल है...कबूल है... :) :)
बोलो ना अब इंशाल्लाह...अब तो तुम जल्दी से नहीं बोल रहे हो ;)

Sunday, July 29, 2012

क्या तुम्हें याद है?


मेरी हमेशा से समय से पहले पहुंचने की आदत और तुम्हारी हमेशा देर से आने की आदत...हर मुलाकात में तुम्हारे देरी की शिकायत और नाराजगी। तुम हमेशा कहते तुम देर से क्यों नहीं पहुंचती, लड़कियां तो हमेशा इंतजार करवाती है। तुम्हारे डांट के डर से कितना भी जल्दी करूं फिर भी तुमसे पीछे ही रह जाता हूं। ...लेकिन इतने सालों में भी मै तुम्हारी आदत नहीं सुधार पाई।
तम्हें याद है वो दिन जब हमें लंच के लिए मिलना था...और घर से निकलने से पहले मैने बार-बार कहा था कि आज देर मत करना वरना मै इस बार रेस्टोरेंट के अंदर नहीं बाहर ही इंतजार करूंगी चाहे कुछ हो जाए...और तुमने कहा था अरे जान फिक्र मत करो बस उड़कर पहुंचता हूं तुम्हारे पास...तय समय पर मै पहुंच गई...लेकिन तुम तो हमेशा की तरह गायब थे...मैने भी ठान ली थी आज अंदर तो जाना नहीं है चाहे कुछ हो जाए।
थोड़ी देर बाद आसमान में काली घटाएं छाने लगी तेज बारिश होने वाली थी...मुझे पहुंचे अब आधा घंटा हो चुका था...मैने फोन निकाला और मिलाया, सीधा पूछा कहां हो? अब मै निकल रही हूं। तुमने कहा बस पहुंच गया हूं तुम्हारे लिए कुछ लेने गया था। अब तेज बारिश शुरू हो गई थी...लेकिन जिद में मै बाहर ही खड़ी होकर भीग रही थी, इतने में तुम आए, और तुम्हारा रटा हुआ डायलॉग बहुत देर से इंतजार कर रही हो ना माही? गुस्सा तो बहुत आ रहा था, तुम भी इस बात को समझ रहे थे। मैने गुस्से में पूछा मेरे लिए कुछ लाने में देर हुई ना क्या लाए दो मुझे....तुम मेरा हाथ पकड़कर थोड़ा आगे चले मेरे बैग से छतरी निकालकर खोली और बोले देखो जितनी बारिश की बूंदें हैं ना इतनी खुशियां लाया हूं तुम्हारे लिए...अब गिन लो तुम...इतना सुनते ही मेरे चेहरे पर बड़ी सी मुस्कान आ गई...क्या तुम्हें याद है अनगिनत बूंदों वाली खुशियां??

Monday, July 16, 2012

भीग रही थी यादों में...

clicked by: Mahi S 
तेज़ बारिश मानो मुझे अपने साथ कहीं ले जाना छह रही थी...बहुत दूर कहीं...छाता था साथ में, लेकिन बारिश की बूंदे उन दिनों के एहसास को जीने कह रही थीं. सच ही तो तेज़ हवाओं और आसमान से बरसते पानी ने सब कुछ याद दिला दिया. तुम्हारे साथ बारिश में भीगना।..जानबूझकर तेज़ बारिश में कार से बहार निकलना और मुझे भी बारिश में खींचना...घर की बालकोनी में खड़े होकर उजले आसमान को देखना और एक दुसरे की और देखकर बिना बोले ही मुस्कुराना...तुम्हारे बार बार ऑफिस से निकलने की जिद करना और मेरा कहना की कैसे आऊं बॉस मौसम की भाषा समझता ही नही है...फिर भी तुम्हारा घंटों ऑफिस के बहार मेरे लिए इंतज़ार करना..मेरे आने पर सीसीडी में साथ बैठकर कॉफ़ी पीना...घर लौटे वक़्त इंडिया गेट में हाथों में हाथ डाले टहलना और ठंडी हवा क बीच एक ही भुट्टे को खाना...कुछ ख़ास तो था उन दिनों में.....

और आज....

बारिश भी वहीँ है हम-तुम भी वही लेकिन बारिश की बातें महज़ एक sms से हो जाती है...फोन करके  थोड़ी बात...या फिर मेरे फोन करने पर तुम्हारा कहना थोडा बिजी हूँ अभी तुम्हे फोन करता हूँ।..और बाद में जब तुम्हारा फोन आता भी है तो बारिश की वो ठंडक उमस बन चुकी होती है....न तो वोह बालकोनी है न तुम दिल्ली में...तुम्हारा कहना ठीक है वक़्त क साथ रिश्ता मज़बूत होता है...चीज़ें बदलती हैं, गंभीर होती हैं...लेकिन मेरे लिए तो वक़्त वही था...बारिश.. इंडिया गेट.. कॉफ़ी.. इंतज़ार..भुट्टा...बालकोनी...कुछ तो ख़ास था उन दिनों में...या तो वक़्त ख़ास था या फिर बारिश!!!

Thursday, September 1, 2011

....एक और अफसोस


तुम 1 सितंबर की वापसी की फ्लाइट बुक कर लो.. बस मै कुछ नहीं जानती। बर्थडे वाले दिन मेरे साथ रहना मैने कुछ प्लान किया है। 
- माही ऐसा नहीं हो सकता... मै ईद पर घर जा रहा हूं और मै ईद के अगले दिन वापस नहीं लौट सकता। 27 अगस्त को जाऊंगा और 3 सितंबर को ही लौटूंगा। तुम मेरा बर्थडे 3 को ही मना लेना। 
बस कुछ इसी तरह की बहस पूरा अगस्त मेरे और शारिक के बीच चली। ईद के लिए शारिक घर जा रहा था और मै उसे बस इतना रिक्वेस्ट करती रह गई कि जन्मदिन वाले दिन दिल्ली लौट आना, फिर हम जयपुर चले जाएंगे। लेकिन शारिक अपनी जिद में और जिद में मै भी कम नहीं हूं। पता था इतना लड़ाई झगड़ा करके भी उसका फैसला नहीं बदलेगा लेकिन फिर भी...... इतना झगड़ा हुआ जिसकी कोई हद नहीं। 27 की सुबह शारिक और काशिफ दिल्ली पहुंच गए। शारिक की दोपहर को फ्लाइट थी, मुझे पता था दिल्ली आने के बाद उसे जरूर मेरे ऊपर प्यार आएगा। लेकिन इस बार मेरा गुस्सा आपे से बाहर था, उसके जाने के करीब चार दिन पहले से मैने उससे बात करनी बंद कर दी थी। उस दिन सुबह से ही मैने फोन बंद करके रखा था, ऑफिस की छुट्टïी भी थी चाहती तो जाकर मिल सकती थी लेकिन मैने भी ठान ली थीए इस बार मुझे कॉम्प्रोमाइज करना ही नहीं है। 
खैर शारिक ने बहुत कोशिश की और आखिर फ्लाइट के टाइम से पहले एसएमएस कर दिया कि निकल रहा हूं। तकलीफ हो रही थी, पर मै पता नहीं मन ही नहीं हुआ। हमेशा से मै चाहती हूं कि शारिक घर और मुझे बैलेंस करके चले, लेकिन वो ऐसा कभी नहीं करता। घर पहुंचकर भी उसने बहुत बार फोन किया लेकिन मैने उठाया ही नहीं। कल ईद थी और आज उसका बर्थडे है । ये पहली ईद और बर्थडे है जब मैने उससे बात नहीं की है। बहुत सारे अफसोस है जिंदगी में एक और अफसोस सही। 

Friday, August 5, 2011

पता नहीं वक़्त बदलता है या लोग

वक़्त तो तेज़ी से बढ़ रहा है लेकिन समझ ही नहीं आता है की वक़्त बदलता है या लोग? इस बात को लेकर मेरे और शारिक के बीच न जाने कितनी ही बहस होती है, उसका कहना होता है की वक़्त के साथ रिश्ते गंभीर होते हैं तो मुझे लगता है लोग बदलते हैं. बदलाव चाहे जिमेदारियों की वजह से आये या फिर काम की वजह से बदलाव तो आते ही हैं. अब मै आपको  2 अगस्त का किस्सा सुनाती हूँ. यह हमारी एनिवेर्सेरी है, हर साल की तरह मुझे इंतज़ार की साहब मुझे फ़ोन करेंगे, हम लोग बात करेंगे और एक बार फिर पुराने दिन को याद करेंगे. इन सब बातों के साथ मेरे दिन की शुरुआत हुई. सुबह मै तैयार हुयी और मैंने वही कपडे पहने जो कभी मै उससे पहली बार मिलने पर पहने थे. अच्छा लग रहा था, सुबह से मई बहुत कुश भी थी. लेकिन मेरी ख़ुशी दोपहर तक गायब हो रही थी. मेरी नज़रें सिर्फ और सिर्फ फ़ोन पर थी. लेकिन 2 बजे तक भी शारिक ने कोई फ़ोन नहीं किया तो मैंने ही हार कर उसे एक sms किया..sms में लिखा " happy 2 august..love u n thnx for not remembering the day" थोड़ी देर बाद उसका भी जवाब आया; लेकिन अब भी उसके पास इतनी फुर्सत नहीं थी की वो एक फ़ोन करे. गुस्सा तो बहुत आ रहा था पर उससे भी ज्यादा वो सब बातें याद आ रही थी जहाँ से सब कुछ शुरू हुआ था. 
अब मेरा ऑफिस भी नॉएडा हो गया है. मेरी और शारिक की कहानी भी यहीं आस पास से शुरू हुई थी. शारिक शिप्रा सनसिटी में रहता था. बस काम में मन ही नहीं लग रहा था. थोड़ी देर सीट में बैठने के बाद मै ऑफिस की छतपर चली जाती. इस ऑफिस की छत से सनसिटी साफ़ नज़र आता है. बस चाय की चुस्की और हलकी बारिश में मै मनो फ्लाश्बैक में चली गयी थी. ज़िन्दगी का सबसे खूबसूरत वक़्त मनो उन कुछ घंटो में मैंने देखा.  मन कर रहा था वक़्त एक बार फिर पीछे चले जाये और मै उस ज़िन्दगी को एक बार फिर से जे लूँ. सनसिटी के वो दिन बहुत याद आते हैं आज भी. वो इत्मीनान, वो सुकून, वो ख़ुशी, वो पल आज चाह कर भी नहीं मिल सकते हैं. खैर जैसे तैसे शाम तोह गुज़री लेकिन उदास होने के साथ ही गुस्सा भी बहुत आ रहा था. लग रहा था फ़ोन करके खूब झगडा करूँ फ़ोन भी किया, झगडा शुरू भी हुआ लेकिन रोज़ा चलने की वजह से ज्यादा नहीं झगड़ी.
परेशान मै बस सुकून ढून्ढ रही थी, मैंने ऑफिस से ऑटो किया और सीधा आनंद विहार आ गयी. पहले सोचा घर जून, फिर मन में आया क्या हुआ अगर शारिक साथ नहीं है तो, मै तोह उस जगह जा ही सकती हूँ जहाँ हम मिले. मै ऑटो से उतरकर सीधा edm mall आ गयी. मैंने वहां straberry crush icecream लिया और जाकर उस्सी जगह में बैठ गयी जहाँ मै और शारिक जाया करते थे. एक बार फिर वही सब आँखों के सामने से गुज़र रहा था. मैंने शारिक को फ़ोन किया, और पूछा सिर्फ एक बात बता दो शायद यही सुनकर थोडा ठीक लगे, सिर्फ इतना बता दो की वक़्त बदलता है लोग ? लेकिन उसकी तरफ से कुछ जवाब नहीं आया, अक्सर ऐसे जवाब शारिक हमेशा देने से बचता है. लेकिन मेरे सच में कोई बताये वक़्त बदलता है या लोग???

Tuesday, March 29, 2011

प्यार के भूत ने डराया

Jaipur road view from volvo
शारिक के साथ लम्बे समय से बहुत झगडा चल रहा था . झगडा ऐसा कि उसका कोई हल नहीं. लेकिन इतना ज्यादा तनाव अब बर्दाश्त के बहार हो रहा था. ऊपर से साहब का उखाड़ा मिजाज़. समझ ही नहीं आ रहा था कि किस तरह सब ठीक हो. ऑफिस से निकलते ही मेरा पहला काम होता है शारिक को फ़ोन करना. लेकिन इतने लड़ाई झगडे के बीच वो मुझसे बात तक नहीं कर रहा था. इस सिलसिले को अब बहुत दिन हो गए थे.  अगर भूले भटके किसी भी तरह हम फ़ोन पर आते भी तो मिनट नहीं लगता झगडा शुरू होने में. बस फिर तो फ़ोन पर रोने और चिल्लाने के अलावा कोई बात ही नहीं होती. कुछ देर बात दोनों ही फोन रख देते. बात इतनी बिगड़ने लगी थी कि शारिक के साथ ही रहने वाले उसके बचपन के  दोस्त काशिफ के साथ भी अब ख़राब बर्ताव कर रहा था. इससे उन दोनों के बीच मनमुटाव बढ़ रहा था, चीज़ें लगातार ख़राब हो रही थी.जब कभी मै फ़ोन में इस बारे में कुछ पूछती तो उसे अच्छा नहीं लगता, काशिफ  से पूछती तो उसे भी इस बारे में कोई बात नहीं करनी होती. मैंने 24 मार्च 2011 को सोचा कि अब जयपुर जाकर ही दोनों से बात करनी होगी. इस बारे में मैंने शारिक को कुछ नहीं बताया. लेकिन काशिफ ज़रूर जनता था कि मै शनिवार को आ रही हूँ. घर में माँ के सामने भूमिका बनायी कि किसी सेमिनार के लिए गुडगाँव जाना है और लौटना सोमवार 28 मार्च को होगा. बस जिस तरह से मैंने प्लान बनाया उसी के मुताबिक मैंने शुक्रवार को अपना बैग तैयार किया. दो दिन के मुताबिक कपडे और ज़रूरी सामान रख लिया. ऑफिस के काम कि वजह से शनिवार को घर से भी जल्दी निकलना पड़ा. ऑफिस का काम भी इतना हो गया था कि शाम के साढ़े सात बज गए और मै निकल ही नहीं पा रही थी. काशिफ का फ़ोन आया तो उसे बताया कि 8 बजे ऑफिस से निकलूंगी. मेरा ऑफिस दिल्ली के दिल यानि कनाट प्लेस में है. हालाँकि वहां से जयपुर कि बस के लिए बीकानेर हाउस पहुँचने में भी ज्यादा समय नहीं लगता, लेकिन उस दिन मानो घडी कि सुइयां उड़ान भर रही हो. 8 बजे मै ऑफिस से निकली, जयपुर पहुँचने कि जल्दी में उस दिन मुझे न तो कनाट प्लेस कि सडकें अच्छी लग रही थी, न सेंट्रल पार्क की रौनक, न उस दिन का अच्छा मौसम . परेशानियाँ यहीं कम नहीं हुयी थी, ऑफिस से बाहर निकलने के बाद ऑटो ही नहीं मिल रहा था, देर पर देर हो रही थी. दिमाग में बस एक ही बात थी कि कैसे भी जल्द से जल्द जयपुर पहुंचना है. ये जानते हुए भी कि बस को जितना टाइम लेना है उतना वो लेगी ही. खैर मैंने इसी उधेड़ बुन में एक ऑटो किया और सीधा जाकर बीकानेर हाउस उतरी. सबसे पहली जो बस थी उसका टिकेट लिया और बस में बैठ गयी. अजीब भूत सवार था मेरे दिमाग में, लग रहा था की 6 घंटे का सफ़र कुछ ही देर में पूरा हो जाये. बस चलने के बाद मैंने काशिफ को बता दिया. उस वक़्त तक भी साहब का मेरे पास कोई फ़ोन नहीं आया था, वो भी जिद में था और मै भी अपनी जिद में. किताब पढ़ते हुए और गाने सुनते सुनते मेरे जयपुर का सफ़र शुरू हुआ. लेकिन न तो किताब में मन लग रहा था और न ही गानों में. 
पहले सोचा कि काशिफ को बस स्टैंड लेने आने को कहूँ, फिर सोचा कि शारिक को ही एक  घंटे पहले फ़ोन करके कहूँगी कि बस स्टैंड लेने आओ. अब जयपुर महज़ 74 किलोमीटर रह गया था मैंने शारिक को फ़ोन करना शुरू किया. उस वक़्त रात के सवा एक बज रहे थे. लेकिन हज़ार बार फ़ोन करने के बाद भी उसने फ़ोन नहीं उठाया. फिर मैंने काशिफ को कहा कि तुम ही आ जाओ. रात के नक्स बजे बस जयपुर के  बस स्टॉप सिन्धी कैंप पहुंची. काशिफ वहीँ खड़ा था. हम गाडी में बैठे और रात के ढाई बजे घर आये. शारिक अपने कमरे में सो रहा था. काशिफ और मै सुबह के करीब साढ़े चार बजे तक बात करते रहे. अचानक देखा कि नींद शारिक  अपने कमरे से बहार आया और फ्रिज खोलकर पानी पीने लगा. फिर बाथरूम कि तरफ चला गया. मैंने जल्दी से काशिफ को सोने के लिए कहा और बाहर के कमरे कि लाइट बंद करके साहब के कमरे में चली गयी. कमरे कि लाइट बंद थी, मै जाकर चुप चाप बिस्तर में जाकर बैठ गयी. थोड़ी देर बाद शारिक कमरे में आया नींद में अचानक अँधेरे कमरे में इस तरह एक लड़की को बैठा देख उसके चेहरे कि हवाइयां उड़ने लगी. आँख मलकर उसने दो बार ठीक से देखने की कोशिश की जब उसे सच में वहां किसी के होने का एहसास हुआ तो वो कमरे से बहार चला गया. उसके बाद मै उसके आने से पहले दरवाज़े के पीछे जाकर खड़ी हो गयी. फिर थोड़ी देर बाद वो कमरे में आया, बाहर से ही एक बार कमरे में झाँका, अन्दर आकर ठीक से बिस्तर को देखा और उसके बाद उल्टा होकर सो गया. ठीक इसके बाद मैंने कमरे का दरवाज़ा बंद किया, दरवाज़ा बंद करने की एक अजीब सी आवाज़ हुई, मै उसके पास गयी और उसके ऊपर जाकर सो गयी. डर से वो चीख कर उठा और बोलने लगा कौन है और यह बोलते हुए काशिफ को आवाज़ देने लगा. फिर अपने आप ही बडबडाने लगा की पता नहीं मुझे क्या हो रहा है, मुझे माही क्यूँ दिख रही है. अब मै समझ गयी थी की नींद में है और डर भी रहा है. वो परेशान था की शायद लम्बे समय से चल रहे झगडे की वजह से उसके साथ ऐसा हो रहा है. वो बार बार मुझे छुकर देखता, मुझसे पूछता माहि तुम ही हो क्या? अचानक लाइट जलने के लिए उठा तो मैंने उसके लिए भी उसे रोक दिया. अब उसे पूरा यकीन हो गया था की कमरे में कोई भूत है. वो फिर जोर से काशिफ को आवाज़ लगाने लगा. अब इस तरह बहुत देर हो गयी थी सुबह के साढ़े पांच बज चुके थे. मैंने लाइट जलायी और उसे कहा की मै ही हूँ. इस तरह अचानक मुझे देखकर वो हैरान हो रहा था, कुछ देर तो कुछ बोल ही नहीं पाया. एक साथ उसने मुझसे न जाने कितने सवाल पूछ लिए. शायद प्यार के भूत ने उसे इतना डरा दिया था की उसे समझ ही नहीं आ रहा था की वो क्या कह रहा है. दर से चेहरा पीला पड़ गया था और हाथ पैर ठन्डे हो गए थे. सिर्फ इतनाभर बोल पाया की माही मेरा दिल बैठने को है मुझे थोडा पानी लाकर दो.