About Me

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delhi, India
I m a prsn who is positive abt evry aspect of life. There are many thngs I like 2 do, 2 see N 2 experience. I like 2 read,2 write;2 think,2 dream;2 talk, 2 listen. I like to see d sunrise in the mrng, I like 2 see d moonlight at ngt; I like 2 feel the music flowing on my face. I like 2 look at d clouds in the sky with a blank mind, I like 2 do thought exprimnt when I cannot sleep in the middle of the ngt. I like flowers in spring, rain in summer, leaves in autumn, freezy breez in winter. I like 2 be alone. that’s me
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Thursday, January 12, 2012

मै वहीं हूं वक्त गुजर गया...

अभी लगता है कल की ही बात है, लेकिन कैलेंडर के पन्नों को उलट कर देखा तो अहसास हुआ कि बहुत वक्त गुजर चुका है। कल का पूरा दिन ऐसे ही गुजरा, उदास सुबह, उदास शाम। पता नहीं  क्या चल रहा था मेरे अंदर, कुछ लिखने का भी मन नहीं हुआ। दो-तीन बार लिखने के लिए बैठी। मन बुझा हुआ था, बुरा लग रहा था। ऑफिस के बाद जब कॉफी डे में अकेले जाकर बैठी तो लगा वो खलिश आज भी है और शायद कभी जाएगी भी नहीं, मै किसी से बात नहीं करना चाहती थी, शारिक से भी नहीं, उसने भी मुझे कोई फोन नहीं किया। मुझे लगा कि शायद साढ़े आठ बजे तक उसका फोन आए, मै बैठी थी कॉफी और किताब के साथ, तभी फोन बजा मां थीं, मां क फोन की घंटी से लगा कि देर हो चुकी है। घर जाने का भी मन नहीं था लेकिन जाती भी कहां..... पीछे मुड़कर देखती हूं तो लगता है मै वहीं खड़ी हूं और मेरे आस-पास से सब गुजर गया है, पता नहीं क्या चाहती है ये जिंदगी...खैर जिंदगी है, शायद एकदम सपाट गुजरे तो उसके होने का अहसास ही न हो...

Tuesday, October 18, 2011

मुझे आज भी याद है...

Just wanted to let you know... You're in my thoughts... all the time!
 ऐसी ही गुनगुनी धूप, अचानक बदलता मौसम और ठंड की आहट के बीच हम दोनों शिप्रा सनसिटी के पास बने टंडे कबाब में खाना खाना गए थे। वैसे तो बात बहुत साल पहले की है लेकिन इस दिवाली की तैयारियों के बीच अचानक मुझे वो दिन याद आ गया।  वो भी दिवाली के आस-पास के ही दिन थे। दिवाली की तैयारियों को लेकर शारिक हमेशा ही मुझसे अपडेट लिया करता था। मै भी उत्साहित रहती थी। खुले आसमान के नीचे बैठकर जब हम खाना खा रहे थे अचानक मैने चहकते हुए बोला शारिक दिवाली वाले दिन शिप्रा वाले फ्लैट में भी दिए जलाना, बहुत खूबसूरत दिखेगा घर। शारिक ने हामी भरी, लेकिन बहुत ज्यादा कुछ नहीं बोला।
खाना खाने के बाद हम घूमे फिरें फिर उसने मुझे घर छोड़।
इन्हीं तैयारियों के बीच दिवाली भी आ गई। उस दिन मै सुबह के वक्त शारिक से मिलने आ गई। हम दोनों घूमे फिरे, फिल्म देखी, खाना-खाया, पिज्जा खाया और खूब मौज-मस्ती की। इस बीच हमेशा की तरह नोंक-झोंक भी हुई लेकिन दिन बहुत अच्छा गुजरा। शाम होते ही शारिक ने मुझे घर छोड़, उसने मां के लिए एक गिफ्ट भी लिया थो जो गाड़ी से उतरने के बाद उसने मुझे दिया। मुझे भी ये देखकर अच्छा लगा। गाड़ी से उतरने के बाद मैने फिर याद दिलाया कि घर में दिए जरूर जलाना देखो चारों ओर कितनी रोशनी है, वो मुस्कुराया और चला गया।
खूब अच्छी रही वो दिवाली भी घर में मौज मस्ती हुई, मेहमानों का आना-जाना हुआ। खुश भी बहुत थी उस दिन मै। अगले दिन ऑफिस से लौटते हुए शारिक मुझे ऑफिस से लेने आया। मैने पूछा क्या तुमने घर में दिए जलाए थे, पहले उसने बात टाली फिर बोला नहीं माही, हम लोगों में ऐसा करना मना है, मै ये नहीं कर सकता। मै थोड़ी देर चुप रही। मैने कहा शारिक जब मै तुम्हारे साथ ईद मना सकती हूं तो तुम दिवाली क्यों नहीं? कोई भी त्योहार खुशियों का होता है घर में दिए जलाने का मतलब ये तो नहीं कि तुम्हारा धर्म परिवर्तन हो गया। उस दिन का दिन था और आज का दिन है मै गलती से भी किसी त्योहार के बारे में उससे कोई जिक्र नहीं करती। बुरा जरूर लगा था इसलिए शायद वो बात आज तक दिल के किसी कोने में है।

Thursday, September 1, 2011

....एक और अफसोस


तुम 1 सितंबर की वापसी की फ्लाइट बुक कर लो.. बस मै कुछ नहीं जानती। बर्थडे वाले दिन मेरे साथ रहना मैने कुछ प्लान किया है। 
- माही ऐसा नहीं हो सकता... मै ईद पर घर जा रहा हूं और मै ईद के अगले दिन वापस नहीं लौट सकता। 27 अगस्त को जाऊंगा और 3 सितंबर को ही लौटूंगा। तुम मेरा बर्थडे 3 को ही मना लेना। 
बस कुछ इसी तरह की बहस पूरा अगस्त मेरे और शारिक के बीच चली। ईद के लिए शारिक घर जा रहा था और मै उसे बस इतना रिक्वेस्ट करती रह गई कि जन्मदिन वाले दिन दिल्ली लौट आना, फिर हम जयपुर चले जाएंगे। लेकिन शारिक अपनी जिद में और जिद में मै भी कम नहीं हूं। पता था इतना लड़ाई झगड़ा करके भी उसका फैसला नहीं बदलेगा लेकिन फिर भी...... इतना झगड़ा हुआ जिसकी कोई हद नहीं। 27 की सुबह शारिक और काशिफ दिल्ली पहुंच गए। शारिक की दोपहर को फ्लाइट थी, मुझे पता था दिल्ली आने के बाद उसे जरूर मेरे ऊपर प्यार आएगा। लेकिन इस बार मेरा गुस्सा आपे से बाहर था, उसके जाने के करीब चार दिन पहले से मैने उससे बात करनी बंद कर दी थी। उस दिन सुबह से ही मैने फोन बंद करके रखा था, ऑफिस की छुट्टïी भी थी चाहती तो जाकर मिल सकती थी लेकिन मैने भी ठान ली थीए इस बार मुझे कॉम्प्रोमाइज करना ही नहीं है। 
खैर शारिक ने बहुत कोशिश की और आखिर फ्लाइट के टाइम से पहले एसएमएस कर दिया कि निकल रहा हूं। तकलीफ हो रही थी, पर मै पता नहीं मन ही नहीं हुआ। हमेशा से मै चाहती हूं कि शारिक घर और मुझे बैलेंस करके चले, लेकिन वो ऐसा कभी नहीं करता। घर पहुंचकर भी उसने बहुत बार फोन किया लेकिन मैने उठाया ही नहीं। कल ईद थी और आज उसका बर्थडे है । ये पहली ईद और बर्थडे है जब मैने उससे बात नहीं की है। बहुत सारे अफसोस है जिंदगी में एक और अफसोस सही। 

Friday, August 5, 2011

पता नहीं वक़्त बदलता है या लोग

वक़्त तो तेज़ी से बढ़ रहा है लेकिन समझ ही नहीं आता है की वक़्त बदलता है या लोग? इस बात को लेकर मेरे और शारिक के बीच न जाने कितनी ही बहस होती है, उसका कहना होता है की वक़्त के साथ रिश्ते गंभीर होते हैं तो मुझे लगता है लोग बदलते हैं. बदलाव चाहे जिमेदारियों की वजह से आये या फिर काम की वजह से बदलाव तो आते ही हैं. अब मै आपको  2 अगस्त का किस्सा सुनाती हूँ. यह हमारी एनिवेर्सेरी है, हर साल की तरह मुझे इंतज़ार की साहब मुझे फ़ोन करेंगे, हम लोग बात करेंगे और एक बार फिर पुराने दिन को याद करेंगे. इन सब बातों के साथ मेरे दिन की शुरुआत हुई. सुबह मै तैयार हुयी और मैंने वही कपडे पहने जो कभी मै उससे पहली बार मिलने पर पहने थे. अच्छा लग रहा था, सुबह से मई बहुत कुश भी थी. लेकिन मेरी ख़ुशी दोपहर तक गायब हो रही थी. मेरी नज़रें सिर्फ और सिर्फ फ़ोन पर थी. लेकिन 2 बजे तक भी शारिक ने कोई फ़ोन नहीं किया तो मैंने ही हार कर उसे एक sms किया..sms में लिखा " happy 2 august..love u n thnx for not remembering the day" थोड़ी देर बाद उसका भी जवाब आया; लेकिन अब भी उसके पास इतनी फुर्सत नहीं थी की वो एक फ़ोन करे. गुस्सा तो बहुत आ रहा था पर उससे भी ज्यादा वो सब बातें याद आ रही थी जहाँ से सब कुछ शुरू हुआ था. 
अब मेरा ऑफिस भी नॉएडा हो गया है. मेरी और शारिक की कहानी भी यहीं आस पास से शुरू हुई थी. शारिक शिप्रा सनसिटी में रहता था. बस काम में मन ही नहीं लग रहा था. थोड़ी देर सीट में बैठने के बाद मै ऑफिस की छतपर चली जाती. इस ऑफिस की छत से सनसिटी साफ़ नज़र आता है. बस चाय की चुस्की और हलकी बारिश में मै मनो फ्लाश्बैक में चली गयी थी. ज़िन्दगी का सबसे खूबसूरत वक़्त मनो उन कुछ घंटो में मैंने देखा.  मन कर रहा था वक़्त एक बार फिर पीछे चले जाये और मै उस ज़िन्दगी को एक बार फिर से जे लूँ. सनसिटी के वो दिन बहुत याद आते हैं आज भी. वो इत्मीनान, वो सुकून, वो ख़ुशी, वो पल आज चाह कर भी नहीं मिल सकते हैं. खैर जैसे तैसे शाम तोह गुज़री लेकिन उदास होने के साथ ही गुस्सा भी बहुत आ रहा था. लग रहा था फ़ोन करके खूब झगडा करूँ फ़ोन भी किया, झगडा शुरू भी हुआ लेकिन रोज़ा चलने की वजह से ज्यादा नहीं झगड़ी.
परेशान मै बस सुकून ढून्ढ रही थी, मैंने ऑफिस से ऑटो किया और सीधा आनंद विहार आ गयी. पहले सोचा घर जून, फिर मन में आया क्या हुआ अगर शारिक साथ नहीं है तो, मै तोह उस जगह जा ही सकती हूँ जहाँ हम मिले. मै ऑटो से उतरकर सीधा edm mall आ गयी. मैंने वहां straberry crush icecream लिया और जाकर उस्सी जगह में बैठ गयी जहाँ मै और शारिक जाया करते थे. एक बार फिर वही सब आँखों के सामने से गुज़र रहा था. मैंने शारिक को फ़ोन किया, और पूछा सिर्फ एक बात बता दो शायद यही सुनकर थोडा ठीक लगे, सिर्फ इतना बता दो की वक़्त बदलता है लोग ? लेकिन उसकी तरफ से कुछ जवाब नहीं आया, अक्सर ऐसे जवाब शारिक हमेशा देने से बचता है. लेकिन मेरे सच में कोई बताये वक़्त बदलता है या लोग???