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delhi, India
I m a prsn who is positive abt evry aspect of life. There are many thngs I like 2 do, 2 see N 2 experience. I like 2 read,2 write;2 think,2 dream;2 talk, 2 listen. I like to see d sunrise in the mrng, I like 2 see d moonlight at ngt; I like 2 feel the music flowing on my face. I like 2 look at d clouds in the sky with a blank mind, I like 2 do thought exprimnt when I cannot sleep in the middle of the ngt. I like flowers in spring, rain in summer, leaves in autumn, freezy breez in winter. I like 2 be alone. that’s me
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Wednesday, October 16, 2013

...चंद आखिरी पन्‍ने लिख रही हूं

वॉल्‍वो से ली हुई एक पुरानी तस्‍वीर Delhi-jaipur highway
लग रहा है जैसे कुछ आखिरी पन्‍ने लिख रही हूं, जिंदगी के आखिरी पन्‍ने. हां, अधूरे, बेतरतीब से, सच्‍चे, झूठे...टूटे ख्‍वाबों को समेटते हुए लंबा वक्‍त गुजर गया, लेकिन कसक है कि जाती ही नहीं.
आज सुबह से नजरें फोन पर थी, मुबारकबाद सुनने के लिए, एक सलाम के लिए, एक सलाम का जवाब सुनने के लिए. ईद जो थी, इंतजार अब खत्‍म हुआ, लेकिन मायूसी के साथ क्‍योंकि ना फोन बजा, ना मुबारकबाद आई.

कॉफी का कप लेकर जब शाम को खिड़की के पास बैठी तो कुछ महीने पहले तुमसे हुई मुलाकात याद आई. वो मुलाकात जो आठ महीने बाद हुई, वो मुलाकात जो ना कभी दिल से जाएगी और ना नजरों से. 25 अगस्‍त रात को तुम्‍हारा एक मैसेज आया. 'कल दिल्‍ली आ रहा हूं और तुम्‍हे मुझसे थोड़ी देर के लिए मिलने आना होगा. तुम्‍हारा ज्‍यादा वक्‍त नहीं लूंगा, जरूरी काम है प्‍लीज आ जाना.'

ये मैसेज पढ़कर कुछ देर के लिए सांस ही नहीं आई, हाथ-पैर भी ऐसे कांपे जैसे ना जाने क्‍या सुन लिया. दिल फफक-फफक कर रो रहा था, कह रहा था, 'बिना सोचे समझे चली जा.' लेकिन दिमाग ने मना कर दिया. मैने मैसेज लिखा, नहीं आ पाऊंगी, एक बार फिर तुम्‍हे जाते नहीं देख सकती. माफ कर दो, मै नहीं आऊंगी.' ऊधर से तुम्‍हारा मैसेज आया, मीटिंग के लिए आ रहा हूं, गुड़गांव में है, एमजी रोड मेट्रो स्‍टेशन में शाम 5 बजे.'
तुम जानते थे मै आऊंगी, हमेशा की तरह, बिना सोचे समझे, दौड़कर आऊंगी. दिल और दिमाग की कश्‍मकश में रात आंखों में ही गुजर गई. सुबह 6 बजे ऑफिस के लिए भी निकल गई, मॉर्निंग शिफ्ट थी. पूरा दिन तुम्‍हारा कोई फोन नहीं आया था. शायद तुम जानते थे कि मै जरूर पहुंची.

ऑफिस से निकल गई थी, लेकिन घर का रास्‍ता पकड़ने की बजाय मेट्रो लिया. दिल, दिमाग से जीत चुका था, मै तुम्‍हारे पास आने के लिए निकल पड़ी थी. कुछ देर बाद मै एमजी रोड के मेट्रो स्‍टेशन में थी, तुम्‍हारा फोन आया, 'मुझे आने में थोड़ी देर हो जाएगी. तुम थोड़ा इंतजार करना.' मैने धीरे से पूछा, 'तुम इतने यकीन के साथ कैसे कह रहे हो कि मै पहुंच गई हूं?' तुमने जवाब दिया, 'क्‍योंकि तुम माही हो.' इतना कहकर तुमने फोन काट दिया.

थोड़ी देर बाद फिर फोन आया, 'किस गेट पर हो?' इतना सुनकर अब मेरा दिल जोर-जोर से धड़क रहा था, क्‍योंकि आठ महीने बाद तुम्‍हारा चेहरा देखूंगी. मैने कहा, 'गेट नंबर 2. मै वहीं ऊपर सीढि़यों पर खड़ी थी, तुम सामने से पैदल चलकर आ रहे थे, अब आखिरी सीढ़ी पर तुम थे और पहली सीढ़ी पर मै. उन चंद सीढि़यों के बीच से गुजरे इतने साल सरसराकर निकल रहे थे. ना तुम ऊपर आ रहे थे और ना मै नीचे. वहीं से हम दोनों एकदूसरे को देख रहे थे, थाड़ी देर बाद मै नीचे आई. दिल कर रहा था एक बार गले लग जाऊं, बिल्‍कुल पहले की तरह पर शायद बहुत कुछ बदल चुका था या शायद मुझे लग रहा था.

तुम्‍हारी आंखों में नमी थी, पूछा तुमने मुझसे, 'कैसी हो माही?' मै देखा नहीं तुम्‍हारी ओर क्‍योंकि जानती थी मै कि नहीं संभाल पाऊंगी खुदको. हम मेट्रो स्‍टेशन पर ही बने कॉफी कैफे डे में गए. तुमने कॉफी ऑर्डर की, मेरी पसंद की कॉफी, ब्‍लैक कॉफी, लेकिन सिर्फ एक कप. तुमने ही कॉफी में शक्‍कर मिलाई, बिल्‍कुल थोड़ी, जैसा मै पीती हूं. फिर कप उठाकर मुझे दिया. मै चाह कर भी खुद को नहीं रोक पाई, मै रो रही थी और आंसू इतने थे कि थमने का नाम ही नहीं ले रहे थे.

थोड़ी देर बाद तुमने मुझसे कहा, 'माही, मै तुम्‍हारा गुनहगार हूं. मै जानता हूं मैने क्‍या किया है और मुझे जिंदगीभर इस बात का अफसोस रहेगा, लेकिन तुम्‍हे आज देखकर मुझे अपने आप से आज और नफरत हो गई है. क्‍योंकि तुम्‍हारी आंखों में मै वहीं देख रहा हूं जो आठ महीने पहले आखिरी बार मिलते हुए देखा था. मुझे दिल से माफ कर दो माही.' गलती तो हो गई तुमसे, ना अब हम एकदूसरे की जिंदगी में कभी शामिल नहीं हो सकते.

हम दोनों के दर्मियां सिर्फ खामोशी थी. तुमने मुझसे पूछा, 'क्‍या मै एक सिप कॉफी इससे पी सकता हूं?' मैने हामी में सिर हिलाया, तुमने कॉफी का एक सिप पीया. मै बिना तुम्‍हारी ओर देखे, उठकर चली गई.

Saturday, August 31, 2013

'हाथ में है रेत सा इसक़ तेरा...'

मेरे कैमरे की गुस्‍ताख़ी ने सब संजोकर रखा है
घड़ी के हर सेंकेंड को गुजरते देख रही हूं, रात की खामोशी में घड़ी की टिक-टिक मेरे दिल की धड़कन को और बढ़ा रहे हैं. इतना मजबूर खुद को आज से पहले कभी नहीं देखा. 31 अगस्‍त सही रात के 12 बजे हैं,  मै चाहती हूं तुम्‍हें एक बार गले से लगाना और तुम्‍हें जन्‍मदिन की मुबारकबाद देना. Happy Birthday <3
इतने सालों में यह पहला मौका है जब शायद तुम्‍हारा फोन आधी रात
को मेरे नंबर से बिजी नहीं होगा, शायद तुम्‍हारी दुनिया अब अलग है. मेरे साथ नहीं हो, लेकिन शायद इस खलिश को तुम भी महसूस कर रहे होंगे, पता है क्‍यों? क्‍योंकि आदतों को बदलने में थोड़ा वक्‍़त तो लगता है. मुझे आज किसी ने कहा, 'अब जिंदगी में आगे बढ़ो, तुम्‍हारी मुट्ठी से रेत छूट गई है.' मैने चुपचाप सुना, फिर थोड़ी देर बाद उन्‍हें कहा, मुट्ठी से रेत तो फिसल चुकी है पर हाथ खोलकर देखती हूं तो कुछ चमक हथेली में दिखती है, तो आगे कैसे बढूं?
तुम्‍हारे एक बर्थडे का डिनर, जयपुर
बस इतना अंदाजा लगा पाई हूं कि जिंदगी आसान नहीं है और तुम्‍हारे बिना तो बिल्‍कुल नहीं. पिछले साल आज के दिन जयपुर बस स्‍टॉप पर थी, तुम पहुंचे भी नहीं थे मुझे लेने. झगड़ा भी हुआ था क्‍योंकि देर रात मै अकेले आ रही थी वो भी तुम्‍हें बिना बताए. कितना नाराज हुए थे तुम उस दिन. क्‍योंकि तुम भी शहर से बाहर जाने के लिए निकल पड़े थे और इसलिए सिंधि कैंप बस स्‍टॉप पहुंचने में भी तुम्‍हें वक्‍त लगा. बस स्‍टॉप में इंतजार करते हुए साढ़े ग्‍यारह बजे से रात के दो बज चुके थे. उसके बाद भी ठीक से बात नहीं हुई थी, क्‍या पता था उस रात का अफसोस आज इतनी बुरी तरह होगा. शायद इसलिए कहा जाता है, जब जो वक्‍त हो उसे पूरी तरह जी लेना चाहिए पता नहीं वो वक्‍त दोबारों जिंदगी में आए या नहीं.
बस इस पल एक ही दुआ करती हूं अल्‍लाह तुम्‍हारी हर जायज तम्‍मनाओं को पूरा करें और जिंदगी में नई सरबुलंदियां अता फरमाये...आमीन. 

Friday, August 2, 2013

फिर वही तारीख है, पर तुम नहीं हो- 2 August!

कलेंडर के पन्ने घूम कर फिर उसी तारीख पर आ गए, पर देखो ना तुम आसपास हो ही नहीं, कुछ नहीं कहना आज, चुप रहना है. पर यादें उनका क्या करूँ, हज़ार मना करने पर भी सामने आ जाते है. कभी ये मुबारक दिन होता था और आज तन्हा है. मान गए वक़्त तुमको भी...













आखिरी बार जयपुर जाते वक़्त खिंची हुयी तस्वीर है ये. मन को यकीन हो चला था की फिर नहीं आना होगा यहाँ।
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Thursday, June 20, 2013

बेलुत्‍फ जिंदगी, अधूरे ख्‍वाब और तुम...

 Break up Party का केक 
यूं तो सब खास रहा, लेकिन छूटते हुए लम्‍हों को यूं ही नहीं जाने देना चाहती थी मै... ये मेरे थे...सिर्फ मेरे...आखिरी बार जयपुर का सफर, आखिरी कुछ लम्‍हे, वो पल, वो दर्द, वो चुभन, वो घुटन, वो कसक...सब कुछ मेरा था. मैने हर लम्‍हे को कैद किया, अपने पास हमेशा रखने के लिए. दिल्‍ली लौटने के पहले हमने सब कुछ दोराया,  दोहराया, जयपुर के हर कोने को फिर से जीया और उस आखिरी दिन फैमिली डिनर के लिए भी गए.

 वो डिनर सच में खास लग रहा था
, सब अच्‍छे से तैयार हुए थे, मै, तुम, तुम्‍हरा भाई और हमारा सबसे अजीज Mr. K, जयपुर के Barbeque Nation में था ये खास डिनर. Break up Party...

केक काटते हुए हम..

Barbeque Nation स्‍पेशल
सब कुछ पास रहेगा यादों में भी तस्‍वीरों में भी....











तस्‍वीरें तब और खास हो जाती है जब उसमें दिखने वाले लोग साथ नहीं होते...







ख्‍वाहिशों का क्‍या है, ख्‍वाहिशें तो होती ही हैं अधूरी रह ने के लिए...
Life is strange when happiness makes u sad... :(

Saturday, June 15, 2013

कसक

जयपुर: मानसरोवर का फ्लैट Clicked By: Mahi S
मौसम की पहली बारिश, तुम्‍हें ढूंढ़ रही हूं, हर बूंद में....खिड़की के पास बैठी हूं...सब खामोश है, सिर्फ बूंदें बातें कर रही हैं. चेहरे पर आकर जब छू रही है तो मानो एक बार फिर सब कुछ जी रही हूं. तुम्‍हे जी रही हूं, हमारे रिश्‍ते को जी रही हूं, साथ बिताए हर पल को जी रही हूं.
सच में वक्‍त दगाबाज है. तुम्‍हारे बिना बारिश देख रही हूं.... मौसम की पहली बारिश. हर बारिश के साथ एक याद जो जुड़ती है. इस बारिश के साथ शायद यही याद जुड़ी रह जाएगी कि बिना तुम्‍हारे इन बूंदों को समेट रही हूं. याद है तुम्‍हें बरसातों में शिप्रा के टेरेस पर चाय पीना और बरसते पानी के साथ घंटों बैठे रहना...याद है मुझे चाय तुम ही बनाते थे. सब याद आ रहा है आज इन बरसते बादलों को देखकर...
बारिश में मेरे घर के रास्‍ते में अक्‍सर जाम लग जाया करता था और उन दिनों हम दोनों को उस जाम का इंतजार होता था. घर जाने की जल्‍दी तो होती थी रात को, लेकिन जाम में फंसे होने से कुछ घंटे और मिल जाते थे साथ बिताने को... वो खुशनुमा दिन थे...तुम थे...हम थे...तब
जयपुर के हमारे अपने फ्लैट की बालकॉनी से ली हुई तस्‍वीर..
वक्‍त कम पड़ जाता था.  दिल्‍ली के साथ ही जयपुर की बारिश को भी खूब जिया हमने...साल की इस सबसे खूबसूरत सौगात के लिए मै दिल्‍ली से जयपुर पहुंच जाया करती थी. और मेरा पागलपन देख तुम कहते, 'तुम सच में पागल हो...सिर्फ बारिश के लिए जयपुर आई हो..' मै मुस्‍कुराती, मन में सोचती भी कि तुम्‍हें अंदाजा नहीं है, लेकिन मै क्‍या कर रही हूं, बहुत खूब जानती हूं.
तुम्‍हारे बाद मेरा दूसरा हमसफर मेरा कैमरा भी मेरा पूरा साथ देता...बारिश जयपुर को और खूबसूरत बना देता. बिल्‍कुल उजला, धुला हुआ...तुम बारिश रूकने का इंतजार करते और मै बारिश में बाहर निकलने का...वो वक्‍त याद आ रहा है...शिप्रा की बालकोनी, कनॉट प्‍लेस, दिल्‍ली की हर सड़क, हर कोना, ये बारिश आज तकलीफ दे रही है. सब समेट कर रखूंगी, यादों में, तस्‍वीरों में, एहसास में, अल्‍फाज में... आज मौसम की पहली बारिश है...एक खलिश है... तुम याद रहे हो...कहां हो तुम...

Sunday, January 27, 2013

...क्‍यों मुमकिन न हो सका

clicked by: Mahi S

उन पांच दिनों की हर रात न जाने कैसी लग रही थी.....कभी ज़हन से नहीं जाएगी.....और क्यूँ नहीं रहेगी मेरी यादों में, आखिरी कुछ दिन जो थे तुम्हारे साथ, उस घर में, उसकी बालकनी में. मै बदहवास सी होकर पूरे घर में घूम रही थी. उसके हर कोने को छू रही थी. दोनों रो रोकर बेजार थे लेकिन कोई साथ में नहीं था, वक़्त ने तो साथ ना जाने कब से छोड़ दिया था. तुमने कहा माही यही वक़्त है, चलो सब भूल जाते हैं, किस्मत अपना फैसला सुना चुकी है पर ये कुछ वक्‍त हमारा है. इस पर तो खुदा का भी जोर नहीं....मेरे मन में आया खुदा? जाने कौन है ये खुदा?
हम दोनों हाल में बैठ गए, तुमने फिल्म बर्फी लगायी....हम दोनों फिल्‍म देखने लगे. खूबसूरत फिल्‍म, एक खूबसूरत संदेश लिए हुए. मोहब्‍बत का कोई मजहब, कोई भाषा नहीं होती. वो तो मोहब्‍बत है जिससे होती है बेलौस हो जाती है. लेकिन हम अलग हो रहे थे इसी मजहब के लिए....आखिरी कुछ पल एक दूसरे के साथ...
हम दोनों सिर्फ वो गाना सुनने के लिए पूरी फिल्‍म देख रहे थे.....सच बेहद खूबसूरत गाना.... 'इतनी सी हंसी..इतनी सी खुशी..इतना सा टुकड़ा चांद का.......वो गाना आया स्‍क्रीन पर, नहीं रोक पाई अपने आंसू, तुमने भी नहीं पोंछा आंसूओं को. तुम बोले जितना हो सके रो लो...मत रोको खुद को....
मैने तुमसे एक सवाल किया....जिस खुदा की तुम बात करते हो क्‍यों उन्‍होंने मेरी छोटी सी दुनिया को मुक्‍कमल नहीं किया? मैने तो एक दुनिया बनाई, मेरी दुनिया लेकिन क्‍यों आज मै तिनके भी समेट नहीं पा रही हूं, क्‍यों? क्‍यों मुमकिन नहीं हुआ जिंदगीभर एक दूसरे का साथ?

Sunday, December 23, 2012

आखिर नहीं लड़ पाई मै...


jodhpur, clicked by Mahi S
रास्‍ते शायद अगल हो चुके थे अब....दिल का पता नहीं...तुम्‍हारे दिल का!  कभी कुछ था भी या नहीं इस बात पर भी शक होता है. सब हिम्‍मत जुटाकर सिर्फ इतना बोल पाई कि ज्‍यादा से ज्‍यादा वक्‍त मेरे साथ रहो..क्‍या तुम इतना कर सकते हो मेरे लिए? हमेशा की तरह तुम्‍हारे पास मेरे लिए खामोशी ही थी...इस बार तुम्‍हारा जवाब जानना मुझे जरूरी नहीं लगा क्‍योंकि मेरा दिल मान चुका था मै अब जो कर रही हूं वो अपने लिए कर रही हूं. 
खराब तो था ही सब, लंबे समय से....साथ होकर भी अलग ही थे. लेकिन इस बार तुम्‍हें बताकर जयपुर आई थी मै. बोला था मैने इस बार बाहर चलेंगे कहीं. पता नहीं कितने समय बाद तुमने बात नहीं काटी थी मेरी. एक बार में ही कहा ठीक है, जोधपुर ले चलूंगा तुम्‍हें. मै हमेशा की तरह ऑफिस के बाद जयपुर के लिए निकली. रास्‍ते में तुमसे बात भी हुई लेकिन पता नहीं क्‍यों खालीपन लग रहा था मुझे....शायद मेरे मन का खलल था. तुमने कहा, 'मै तुम्‍हारे पहुंचने से पहले ही सिंधी कैंप पहुंच जाऊंगा.' मै अब भी सिर्फ तुम्‍हें स सुनना ही चाह रही थी, देखना चाहती थी क्‍या-क्‍या बोल सकते हो तुम.... 
मै सिंधी कैंप पहुंच गई थी, रात के साढ़े ग्‍यारह बजे थे. तुम पहले ही वहां थे, हाथ में जोधपुर की दो वॉल्‍वो की टिकट के साथ. तुम मेरी ओर बढ़े...मेरे हाथ में एक किताब थी...रविंदर सिंह की 'कैन लव हैपन ट्वाइस'... तुम पास आए...मुझे देखा, किताब को देखा...फिर बोले...'तुम्‍हे नहीं हो सकता'...तुम्‍हारी इस बात से मेरे चेहरे पर मुस्‍कुराहट तो आई लेकिन वो एक सवाल था, फिर भी तुमने मुझे.... 

clicked by Mahi S
तुम्‍हारे हाथ में कप नूडल था, तुमने मुझे दिया और बोले मुझे पता है तुमने रास्‍ते में कुछ नहीं खाया होगा..ये नूडल खा लो... तुम्‍हारी ये फिक्र देखकर मुझे अजीब लग रहा था. हम दोनों वॉल्‍वो में बैठ गए. पहली बार मै घर में जाने से पहले जयपुर से कहीं और के लिए निकली थी....छह घंटे के बाद जब आंख खुली तो एक और नया शहर हम दोनों का स्‍वागत कर रहा था.... जोधपुर की वो सुबह बहुत खास थी और मै तुम्‍हारे साथ....शायद और कुछ दिन के लिए...होटल के कमरे की खिड़की से जब पर्दा हटाया तो आंखों को एक सुकून मिला, नीला खुला आसमान और ऊंची पहाड़ी....मै अकेले खड़ी थी, हमेशा के लिए अकेले...सोच रही थी जिंदगी कैसी होगी तुम्‍हारे बिना...आखिर नहीं लड़ पाई ना नियति से ना ही तुमसे..... 

Friday, November 16, 2012

खो गया अक्स, खो गए अलफ़ाज़

@ Bhangarh
मुझे याद आ रहा है, उस दिन जब तुम शाम को ऑफिस से लौटे थे और मै तुम्हे पानी देने के बाद दिन भर की साडी बातें तुम्हे एक ही सांस में बता रही थी। बिना तुम्हारी तरफ देखे, मै सिर्फ बोली जा रही थी। शौपिंग में आज इतना डिस्काउंट मिला, घर की साडी ग्रोसरी ललकार आई, एक लाल रंग का दुप्पटा लिया, ड्राईवर देर से आया, नीचे के फ्लैट में नयी फॅमिली आई है उनसे दोस्ती हुयी, उन्हें मैंने शाम को चाय पर बुलाया...तुम हमेशा की तरह मेरी बातें सुन रहे थे।
 मेरी बातों को बीच में रोकर तुमने मुझे एक कप चाय बनाने को कहा। मै चाय बनाने चली गयी, चाय लेकर आई तो तुम अख़बार लेकर बैठे थे, मै छह रही थी तुम मुझसे बात करो। मैंने तुम्हे बोला भी "क्या तुम चाय और अख़बार लेकर बैठ गए, मुझसे बात करो, सुनो न ठीक से मैंने पुरे दिन क्या किया।" पर तुम तो बस सिर हिलाकर जवाब दिया। मुझे अच्छा नही लगा, मै उठकर चली गयी। आईने के सामने मई तैयार हो रही थी, काजल उठाकर अभी लगा ही रही थी की आईने में तुम नज़र आये। मैंने भी तुम्हे अनदेखा किया और अपनी आँखों में काजल लगाने लगी। तुम मेरे करीब आये, मुझे धीरे से अपने पास खींचा, मैंने तुम्हारी तरफ नाराज़गी से देखा, फिर तुमने धीरे से मेरे कान में कहा "माही, तुम जब अपनी इन काजल वाली आँखों से मेरी तरफ देखती हो ना तो मुझे साडी बातें समझ आ जाती है...तुम्हारी बातें समझने के लिए मुझे अल्फाजों की ज़रूरत नहीं है। 


आज 
आज मै आईने के सामने हूँ, काजल लगा रही हूँ लेकिन आज मेरी आँखों की तारीफ करने के लिए ढूँढने पर भी तुम्हारा अक्स आईने में नज़र नहीं आ रहा है। काजल आज भी लगा रही हूँ.... क्यूंकि तुम्हे पसंद है मेरी काजल लगी आँखें....तारीफ करने के लिए तुम नहीं हो, लेकिन काजल से कह रही हूँ "मेरी आँखों में ऐसे रहना की किसी को मेरी सूजी आँखें ना दिखे। आज ना तुम्हारा अक्स है ना तुम्हारे अलफ़ाज़। 

Monday, September 10, 2012

वो टुकड़ा धूप का...


मैने सुबह उठते ही घर के सारे दरवाजे खिड़की खोल दिए थे, कुछ देर बाद ही तेज हवा घर से आर पार हो रही थी। हवा का पर्र्दों के साथ लुका-छिपी का खेल चल रहा था पूरे घर में, खिड़की और बॉलकोनी में लगे विंड चाइम भी हवा के साथ अठखेलियां कर रहे थे। तुम्हारा मूड उस दिन बहुत अच्छा था और मेरा खराब, पता नहीं उदासी लग रही थी उस सुबह में मुझे। तुम ऑफिस चले गए, मैने भी कुछ नहीं कहा था, ज्यादा बात भी नहीं की।
बेचैनी को समझ नहीं पा रही थी..किताबों के साथ बैठ गई दिल बहलाने सोफे पर ही बैठे आंख लग गई। उस दिन तुम जल्दी आ गए थे घर, मै चुप थी, तुमने भी मुझसे कुछ खास बात करने की कोशिश नहीं की। काफी देर हो गई थी अब, तुम्हे देखने बेडरूम की तरफ गई, खिड़की खुली थी, धूप का एक टुकड़ा अंदर झांक रहा था, लेकिन थोड़ी-थोड़ी देर में टुकड़ा छोटा हो रहा था। तुम वहीं बेड पर खामोशी से बैठे थे, मै वहीं पास जाकर बैठ गई तुम्हारे...थोड़ी देर बैठे रहे दोनों...चुपचाप... तुम थोड़ी देर बाद उठे, तुमने अपना हाथ दिया और मुझे डांस के लिए बुलाया मै कुछ समझ नहीं पाई। तुम उसी धूप के टुकड़े पास ले गए मुझे जो धीरे-धीरे छोटा हो रहा था। अचानक मेरे कान में तुमने धीरे से कहा, हमें इसी टुकड़े पर डांस करना है ये जितना छोटा होगा, हम उतने ही पास होंगे। मै सिर्फ तुम्हें देख रही थी और उस धूप के टुकड़े को भी, लग रहा था मानों दोनों ने साथ में तैयारी की थी। अब टुकड़ा बहुत छोटा हो गया था और हम दोनों बहुत पास थे, एक-दूसरे को ऐसे देख रहे थे जैसे पहले कभी नहीं देखा हो। तुम अचानक बोले मुस्कुरा के जल्दी से बॉय बोलो इस धूप के टुकड़े को नहीं तो नाराज होकर कल आएगा नहीं....मैने देखा सच में एक लकीर भर थी अब जो किसी भी वक्त ओझल हो जाती...दोनों मुस्कुराए...वो टुकड़ा हमें साथ में छोड़कर चला गया था...

Friday, March 23, 2012

मेरी जिंदगी और हरियाली


दिल्ली से जयपुर जाने पर दो काम निश्चित तौर पर होते हैं एक शारिक साहब से झगड़ा और दूसरा जयपुर से शॉपिंग। इन दानों को किए बगैर मै वहां से लौटती ही नहीं हूं। इस बार भी यही हुआ। खैर ये अब आम बात हो गई है, हम दोनों शॉपिंग के लिए निकले घर के जरूरी सामान की खरीदारी करनी थी। सबकुछ लेने के बाद शारिक ने कहा तुम अपने लिए कुछ अच्छे सूट ले लो। सूट इतने ले चुकी थी कि कुछ खास मन नहीं था लेने का लेकिन उसकी रूचि को देखकर मैने मना नहीं किया। दो-चार दुकान घूमे लेकिन कुछ खास पसंद नहीं आया। शारिक का भी होता है लो तो बहुत अच्छा और एक साथ बहुत सारा। बहुत घूमने के बाद बापू बाजार के एक अच्छी दुकान में हम दोनों को सूट पसंद आ गए। हमने भी चार-पांच सूट ले लिए। बिल करवाया और पूरा बाजार खरीदने के बाद सामान गाड़ी में भरने लगे। सूट सभी बहुत खूबसूरत थे, हम रास्ते में भी इन्हें कैसे बनाएंगे यही बातचीत कर रहे थे।
रात घर पहुंचने के बाद शारिक बोला माही निकालना सारे सूट देखते हैं सब कैसे लिए हैं हमने, मै गई और सारे पैकेट निकाल लाई। अरे ये क्या... सारे सूट के कपड़े हरे रंग के, हल्का हरा, गहरा हरा, लाल के साथ हरा, भूरे के साथ हरा, हरा हरा हरा। दोनों  ने एक दूसरे की तरफ देखा और दोनों की ही हंसी छूट गई। :)
असल में शारिक को हरा रंग बहुत पसंद है और मै जब खरीदारी के लिए जाती हूं तो कुछ पसंद नहीं करती, सब उसी की पसंद का। इस बार भी खरीदते समय एक बार भी ध्यान नहीं गया कि हमने ढेर सारे कपड़े हरे रंग में ले लिए है। अब क्या, शारिक बोला कल जाकर बदल लाएंगे एक-दो सूट। फिर बोला माही मैने तुम्हे जो पहला कुर्ता दिलाया था वो भी शायद हरा था ना, मेरे चेहरे पर भी एक मुस्कुराहट आ गई। :)
सही में शारिक ने मुझे जो पहला कुर्ता दिलाया था वो भी हरे रंग का ही था। मुझे आज भी याद है वो अपने ऑफिस से अचानक कनॉट प्लेस पहुंचा था। मुझे फोन किया और बोला ऑफिस के बाहर आओ। मै बाहर आई और हम दोनों सीपी के गलियारों में टहलने लगे। कुछ देर बाद बोला तुमने एकदम अच्छे कपड़े नहीं पहने हैं, चलो कुछ खरीदते हैं। मेरे लाख मना करने पर भी वो नहीं माना। हम वहीं के फैब इंडिया चले गए जहां से मै कुर्ते खरीदती हूं। नए-नए रिश्ते में मुझे थोड़ी झिझक भी हो रही थी। लेकिन उसने दो कुर्ते पसंद किए उस  वक्त भी दोनों कुर्ते हरे थे एक हल्का हरा और दूसरा गहरा हरा। आज भी उस कुर्ते को पहनने के लिए निकालती हूं तो पुरानी सारी बात रील की तरह आंखों के सामने चलने लगती है। आखिर में आकर यही लगता है कि वक्त के साथ या तो रिश्ता मैच्योर हो जाता है या फिर बिखरने लगता है।
पता नहीं इतने बदलाव को क्या कहना ठीक होगा। :(
खैर इस बार भी हरियाली से मैने अपनी पूरी अलमारी को भर लिया है। शारिक की पसंद जो थी कैसे कुछ और पसंद करके ले आती, उसकी जिद पर दोबारा गए हम कपड़े बदलने लेकिन मेरा मन नहीं था, फिर हमने एक नया सूट लिया और एक बदल लिया। लेकिन मै उन्हीं कपड़ो को चाहती थी इसलिए घर आकर मैने बदले हुए कपड़े को वहीं अलमारी में रख दिया, उसे अपने साथ घर नहीं लायी। मुझे सब वैसे ही चाहिए बदला हुआ कुछ भी नहीं...

Wednesday, February 22, 2012

वक्त से पहले किस्मत से ज्यादा कुछ नहीं मिलता

कुछ पुरानी चली आने वाली बात पर तब यकीन होता है जब ये खुद के साथ होती है। कुछ ऐसा ही हुआ इस सप्ताह.. जयपुर मकान की रजिस्ट्री होनी थी, शनिवार छुट्टी होती है तो दो दिन की और छुट्टी ले ली कि मकान की रजिस्ट्री में वहां मौजूद रहूंगी। शारिक के जिंदगी के सबसे बड़े दिन मै उसके पास होंगी।
शनिवार जयपुर पहुंची, रविवार, सोमवार छुट्टी थी तो रजिस्ट्री का काम मंगलवार के दिन होना था। इन छुट्टी के दो दिन नए घर का सारा फर्नीचर खरीदा, एक-एक छोटी-बड़ी चीज। बहुत ही ज्यादा खुशी और इंतजार मकान की रजिस्ट्री का। लेकिन कहते हैं वक्त से पहले और किस्मत से ज्यादा किसी को कुछ नहीं मिलता। मंगलवार को सारा काम हो गया बस एसडीएम ऑफिस में जाकर होने वाला काम महज एक छोटी-सी बात के कारण बुधवार के लिए टल गया। इतनी मायूसी जिसकी कोई हद नहीं, इसी दिन के लिए छुट्टी ली सब किया और रजिस्ट्री की तारीख बुधवार हो गई। लाख चाहने पर भी मै रजिस्ट्री के वक्त वहां नहीं थी :( :(
आज बुधवार मै जयुपर से दिल्ली पहुंची, अपने डेस्क पर बैठकर ये लिख ही रही थी कि शारिक का फोन आया और बोला मुबारक हो...,.

Monday, January 16, 2012

एक ख्वाब जो पूरा हुआ


फ्लैट की पहली तस्वीर
 
माही हो गयी बुकिंग...इतने सालों से जो ख्वाब देख रहा था आज पूरा हो गया है... शारिक के इस फ़ोन को सुनने के बाद मै कुछ बोल ही नहीं पाई, ख़ुशी आँखों से बहार आई... 10 जनवरी की यह तारिख उसकी ज़िन्दगी की सबसे ख़ास तारिख बन गयी है. इस ख़ुशी को बयां कर पाना शायद बहुत मुश्किल है. उसका हर ख्वाब इसी तरह पूरा हो.....Allahamdullilah...

sharique's todays facebook status...
"Falling short of words today... M so happy, the dream I have dreamt for many years came true.. Today I have booked my own flat and feeling of satisfaction is immense.. I thank ALLAH for his mercy... Allahamdullilah..."

Friday, August 26, 2011

याद आई खुशी की वो पहली उड़ान


Aamer Palace Jaipur
आज अचानक वो दिन याद आ रहा है जब हर डर को पीछे छोड़कर मैने खुशी की पहली उड़ान भरी थी। पहली बार अकेले दिल्ली से बाहर जाने की हिम्मत की थी। पता नहीं क्या हुआ आज ऐसा, ऑफिस में काम करते हुए खिड़की से बाहर बरसते पानी को देखकर एकाएक वो सब याद आने लगा जब शारिक के दिल्ली छोड़कर जयपुर जाने के बाद मै पहली बार जयपुर गई। सच में बहुत हिम्मत वाला कदम उठाया था। बस तेज बारिश के साथ अचानक सब ऐसे सामने आ रहा था जैसे कोई फिल्म चल रही हो। 
हमेशा सुना करती थी प्यार कुछ भी करवा सकता है लेकिन हमेशा जेहन में एक ही बात आती थी कि क्या सच में ऐसा होता है। यकीन तब हुआ जब खुद इस एहसास को जिया। शारिक...मेरी जिंदगी...मेरी पूरी दुनिया। मेरी और शारिक की कहानी दिल्ली में शुरू हुई थी। दो अलग सोच के इंसान कब एक साथ चलने लगे पता ही नहीं चला। लेकिन अचानक शारिक को जयपुर शिफ्ट होना पड़ा। ये 2010 की बात है। दिल्ली छोड़कर जब वो जा रहा था जैसे अब कहानी यहीं खत्म हो जाएगी, लग रहा था पता नहीं सब कैसे चलेगा, कैसे मिलेंगे। मन बहुत उदास रहता था और जब भी हम मिलते थे तो सिर्फ उदासी होती थी। खैर शारिक फरवरी में जयपुर शिफ्ट हो गया। कुछ सप्ताह तो वो नियमित आता रहा लेकिन काम के दबाव में ये सिलसिला कम होता गया। एक दिन शारिक ने कहा तुम जयपुर आओ, खूब घूमेंगे फिरेंगे, मस्ती होगी। ये सब सुनकर अच्छा तो लग रहा था लेकिन समस्या थी कि जाऊं तो जाऊं कैसे। पहले कभी घर से अकेले बाहर नहीं गई थी, घर में क्या बताऊं, कैसे झूठ बोलूं वगैरह..वगैरह। लेकिन प्यार की ताकत ने सब डर को पीछे छोड़ दिया। एक सहेली के साथ प्लान बनाया और घर में बताया कि उसके दीदी के घर जयपुर जा रही हूं। प्लान के मुताबिकसब तय हो गया। शारिक के पटना से आए दोस्त मुनीर और काशिफ के भाई आमिर का भी मेरे साथ चलीने का प्लान बन गया। 24 अप्रैल 2010 था, शारिक की गुड्गांव मीटिंग थी तो तय हुआ कि शारिक हमें वहां से गाड़ी में ही ले जाएगा। पांच दिन घर से दूर अपनी दुनिया में जाने की खुशी को शायद ही मै शब्दों में बयां कर पाऊं। तय दिन मै, मुनीर और आमिर गुडग़ांव पहुंचे। अब शारिक की मीटिंग में इतनी देर हुई कि सुबह के पहुंचे हमें रात हो गई। खैर जो भी हुआ खाना खाने के बाद रात करीब 8 बजे हम गुडग़ांव से चले और सफर शुरू हुआ जयपुर का। रास्तेभर दोस्तों के साथ मौज-मस्ती, यकीन ही नहीं हो रहा था मै शारिक के साथ इतनी रात को। सबकुछ खुशनुमां लग रहा था, रोजमर्रा की घड़ी के साथ  वाली जिंदगी बहुत पीछे छूट गई थी। देर रात ढाबे में खाना खाया, गाना गया और इस तरह दिल्ली से जयुपर का 6 घंटे का सफर हमने 8 घंटे में पूरा किया। हम रात के 3 बजे करीब जयपुर पहुंचे।  जिसको जहां जगह मिली वहां सो गए। अगले दिन जब सुबह आंख  खुली तो यकीन ही नहीं हुआ कि मै दिल्ली में नहीं हूं। 
वैसे घर से दूर शारिक के साथ का वो वक्त मुझे बहुत भा रहा था। एकदम आजाद, उन्मुक्त जिंदगी, न सोने का समय न खाने और न ही समय की कोई पाबंदी। बस सुबह से जो हम लोगों का दिन शुरू होता आधी रात को जाकर खत्म होता। इस बीच सबसे बड़ी मुश्किल होती घर में मम्मी को फोन करना, इसके लिए पूरा माहौल तैयार करना पड़ता था। एक फोन करने के बाद पूरे दिन उनका एक भी फोन नहीं आता। उन पांच दिनों में मैने पूरा जयपुर देख लिया। एक बात जो आज भी मुझे याद आती है, एक शाम हम बाहर घूम रहे थे, शारिक मुझसे अचानक बोला आज शाम पहले से ज्यादा अच्छी लग रही है। सच में खूबसूरत लग रही थी वो शाम, इतने लोगों के बीच में हम अपनी ही दुनिया में थे। 

Tuesday, March 29, 2011

प्यार के भूत ने डराया

Jaipur road view from volvo
शारिक के साथ लम्बे समय से बहुत झगडा चल रहा था . झगडा ऐसा कि उसका कोई हल नहीं. लेकिन इतना ज्यादा तनाव अब बर्दाश्त के बहार हो रहा था. ऊपर से साहब का उखाड़ा मिजाज़. समझ ही नहीं आ रहा था कि किस तरह सब ठीक हो. ऑफिस से निकलते ही मेरा पहला काम होता है शारिक को फ़ोन करना. लेकिन इतने लड़ाई झगडे के बीच वो मुझसे बात तक नहीं कर रहा था. इस सिलसिले को अब बहुत दिन हो गए थे.  अगर भूले भटके किसी भी तरह हम फ़ोन पर आते भी तो मिनट नहीं लगता झगडा शुरू होने में. बस फिर तो फ़ोन पर रोने और चिल्लाने के अलावा कोई बात ही नहीं होती. कुछ देर बात दोनों ही फोन रख देते. बात इतनी बिगड़ने लगी थी कि शारिक के साथ ही रहने वाले उसके बचपन के  दोस्त काशिफ के साथ भी अब ख़राब बर्ताव कर रहा था. इससे उन दोनों के बीच मनमुटाव बढ़ रहा था, चीज़ें लगातार ख़राब हो रही थी.जब कभी मै फ़ोन में इस बारे में कुछ पूछती तो उसे अच्छा नहीं लगता, काशिफ  से पूछती तो उसे भी इस बारे में कोई बात नहीं करनी होती. मैंने 24 मार्च 2011 को सोचा कि अब जयपुर जाकर ही दोनों से बात करनी होगी. इस बारे में मैंने शारिक को कुछ नहीं बताया. लेकिन काशिफ ज़रूर जनता था कि मै शनिवार को आ रही हूँ. घर में माँ के सामने भूमिका बनायी कि किसी सेमिनार के लिए गुडगाँव जाना है और लौटना सोमवार 28 मार्च को होगा. बस जिस तरह से मैंने प्लान बनाया उसी के मुताबिक मैंने शुक्रवार को अपना बैग तैयार किया. दो दिन के मुताबिक कपडे और ज़रूरी सामान रख लिया. ऑफिस के काम कि वजह से शनिवार को घर से भी जल्दी निकलना पड़ा. ऑफिस का काम भी इतना हो गया था कि शाम के साढ़े सात बज गए और मै निकल ही नहीं पा रही थी. काशिफ का फ़ोन आया तो उसे बताया कि 8 बजे ऑफिस से निकलूंगी. मेरा ऑफिस दिल्ली के दिल यानि कनाट प्लेस में है. हालाँकि वहां से जयपुर कि बस के लिए बीकानेर हाउस पहुँचने में भी ज्यादा समय नहीं लगता, लेकिन उस दिन मानो घडी कि सुइयां उड़ान भर रही हो. 8 बजे मै ऑफिस से निकली, जयपुर पहुँचने कि जल्दी में उस दिन मुझे न तो कनाट प्लेस कि सडकें अच्छी लग रही थी, न सेंट्रल पार्क की रौनक, न उस दिन का अच्छा मौसम . परेशानियाँ यहीं कम नहीं हुयी थी, ऑफिस से बाहर निकलने के बाद ऑटो ही नहीं मिल रहा था, देर पर देर हो रही थी. दिमाग में बस एक ही बात थी कि कैसे भी जल्द से जल्द जयपुर पहुंचना है. ये जानते हुए भी कि बस को जितना टाइम लेना है उतना वो लेगी ही. खैर मैंने इसी उधेड़ बुन में एक ऑटो किया और सीधा जाकर बीकानेर हाउस उतरी. सबसे पहली जो बस थी उसका टिकेट लिया और बस में बैठ गयी. अजीब भूत सवार था मेरे दिमाग में, लग रहा था की 6 घंटे का सफ़र कुछ ही देर में पूरा हो जाये. बस चलने के बाद मैंने काशिफ को बता दिया. उस वक़्त तक भी साहब का मेरे पास कोई फ़ोन नहीं आया था, वो भी जिद में था और मै भी अपनी जिद में. किताब पढ़ते हुए और गाने सुनते सुनते मेरे जयपुर का सफ़र शुरू हुआ. लेकिन न तो किताब में मन लग रहा था और न ही गानों में. 
पहले सोचा कि काशिफ को बस स्टैंड लेने आने को कहूँ, फिर सोचा कि शारिक को ही एक  घंटे पहले फ़ोन करके कहूँगी कि बस स्टैंड लेने आओ. अब जयपुर महज़ 74 किलोमीटर रह गया था मैंने शारिक को फ़ोन करना शुरू किया. उस वक़्त रात के सवा एक बज रहे थे. लेकिन हज़ार बार फ़ोन करने के बाद भी उसने फ़ोन नहीं उठाया. फिर मैंने काशिफ को कहा कि तुम ही आ जाओ. रात के नक्स बजे बस जयपुर के  बस स्टॉप सिन्धी कैंप पहुंची. काशिफ वहीँ खड़ा था. हम गाडी में बैठे और रात के ढाई बजे घर आये. शारिक अपने कमरे में सो रहा था. काशिफ और मै सुबह के करीब साढ़े चार बजे तक बात करते रहे. अचानक देखा कि नींद शारिक  अपने कमरे से बहार आया और फ्रिज खोलकर पानी पीने लगा. फिर बाथरूम कि तरफ चला गया. मैंने जल्दी से काशिफ को सोने के लिए कहा और बाहर के कमरे कि लाइट बंद करके साहब के कमरे में चली गयी. कमरे कि लाइट बंद थी, मै जाकर चुप चाप बिस्तर में जाकर बैठ गयी. थोड़ी देर बाद शारिक कमरे में आया नींद में अचानक अँधेरे कमरे में इस तरह एक लड़की को बैठा देख उसके चेहरे कि हवाइयां उड़ने लगी. आँख मलकर उसने दो बार ठीक से देखने की कोशिश की जब उसे सच में वहां किसी के होने का एहसास हुआ तो वो कमरे से बहार चला गया. उसके बाद मै उसके आने से पहले दरवाज़े के पीछे जाकर खड़ी हो गयी. फिर थोड़ी देर बाद वो कमरे में आया, बाहर से ही एक बार कमरे में झाँका, अन्दर आकर ठीक से बिस्तर को देखा और उसके बाद उल्टा होकर सो गया. ठीक इसके बाद मैंने कमरे का दरवाज़ा बंद किया, दरवाज़ा बंद करने की एक अजीब सी आवाज़ हुई, मै उसके पास गयी और उसके ऊपर जाकर सो गयी. डर से वो चीख कर उठा और बोलने लगा कौन है और यह बोलते हुए काशिफ को आवाज़ देने लगा. फिर अपने आप ही बडबडाने लगा की पता नहीं मुझे क्या हो रहा है, मुझे माही क्यूँ दिख रही है. अब मै समझ गयी थी की नींद में है और डर भी रहा है. वो परेशान था की शायद लम्बे समय से चल रहे झगडे की वजह से उसके साथ ऐसा हो रहा है. वो बार बार मुझे छुकर देखता, मुझसे पूछता माहि तुम ही हो क्या? अचानक लाइट जलने के लिए उठा तो मैंने उसके लिए भी उसे रोक दिया. अब उसे पूरा यकीन हो गया था की कमरे में कोई भूत है. वो फिर जोर से काशिफ को आवाज़ लगाने लगा. अब इस तरह बहुत देर हो गयी थी सुबह के साढ़े पांच बज चुके थे. मैंने लाइट जलायी और उसे कहा की मै ही हूँ. इस तरह अचानक मुझे देखकर वो हैरान हो रहा था, कुछ देर तो कुछ बोल ही नहीं पाया. एक साथ उसने मुझसे न जाने कितने सवाल पूछ लिए. शायद प्यार के भूत ने उसे इतना डरा दिया था की उसे समझ ही नहीं आ रहा था की वो क्या कह रहा है. दर से चेहरा पीला पड़ गया था और हाथ पैर ठन्डे हो गए थे. सिर्फ इतनाभर बोल पाया की माही मेरा दिल बैठने को है मुझे थोडा पानी लाकर दो.